आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रवचन देते हुए कहा कि हमें यह ध्यान देना है कि हमें किन भावों से बचना है, जिससे क्रूरता हमारे अंदर प्रवेश कर जाती है। पांचों पाप करने के बाद भी हम अपनी आलोचना और प्रायश्चित से अपने पापों को काट सकते हैं। पढ़िए एक रिपोर्ट…
रांची। गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रवचन देते हुए कहा कि हमें यह ध्यान देना है कि हमें किन भावों से बचना है, जिससे क्रूरता हमारे अंदर प्रवेश कर जाती है। पांचों पाप करने के बाद भी हम अपनी आलोचना और प्रायश्चित से अपने पापों को काट सकते हैं। अपनी गलतियों को याद कर उनकी आलोचना करना, स्वयं की निंदा करना, आत्मशुद्धि के साधन हैं। पश्चाताप से 99 फीसदी पाप कट जाते हैं। कुछ व्यक्ति वे होते हैं जो सूखे नारियल की तरह होते हैं। जो घर की चारदीवारी में रहते हैं लेकिन घर-परिवार को , धन-संपत्ति को अपना नहीं मानते हैं और दूसरे प्रकार के वे व्यक्ति होते हैं जो गीले नारियल की तरह होते हैं जो गीले नारियल की तरह अपनी घर गृहस्थी के साथ चिपके रहते हैं और मरण करके अपने ही घर की दीवार पर छिपकली बन जाते है।
कड़वी बात भी सहन करने की आदत हो
परलोक में कोई वस्तु अगर काम आती है तो वह है धर्म । न स्त्री काम आएगी , न बेटा काम आएगा , न घर परिवार काम आएगा, सिर्फ धर्म ही काम आने वाला है, धर्म साथी है। जिस चीज को हम जितना अंतरंग से अपना मानेंगे उसके वियोग में हमें उतना ज्यादा संक्लेश होगा । सांप, बिच्छू तथा सिंह जैसे क्रूर जीवों की तरह जो प्रवृत्ति करती है, हर समय क्रोध को करने वाला होता है। वह कृष्ण लेश्या के परिणाम वाला जीव होता है । परिवार में हम जिनके साथ रहते हैं जिनके साथ हमें जीवन बिताना है, उनके साथ अच्छी बातों के साथ – साथ यदि कभी थोड़ी सी कड़वी बात हो गई तो उसको भी सहन करने की आदत होनी चाहिए। हम चाहते हैं कि हम भले ही दूसरों पर गुस्सा करते रहें लेकिन दुसरा मेरे ऊपर गुस्सा न करे। क्रोध का स्वभाव न हो, हम क्रूरता को धारण न करें, हम आपस में लड़ाई – झगड़ा न करे, हम दया और क्षमा को धारण करने की कोशिश करें हम पृथ्वी की तरह सहनशील बने, क्षमा भाव को धारण करें, हमारे साथ कोई बुरा भी करे तो भी हम उसके साथ अच्छा करने का प्रयत्न करे, यहीं हमारा ध्येय होना चाहिए।













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