उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कई बार परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि हम शास्त्र को अथवा धार्मिक पुस्तकों को हाथ में लेकर पढ़ नहीं सकते क्योंकि शुद्धि नहीं होती है किंतु अगर आपको वह कंठस्थ हैं, तो आप उनका मनन और चिंतन अवश्य कर सकते हैं। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि…
-कंठ में विद्या और गांठ में पैसा समय पर काम आता है। विचार करिए अगर आपको भक्तामर पाठ विनती, आलोचना पाठ इत्यादि कंठस्थ याद हैं तो आप दुकान में बैठकर भी धर्म ध्यान कर सकते हैं। कई बार परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि हम शास्त्र को अथवा धार्मिक पुस्तकों को हाथ में लेकर पढ़ नहीं सकते क्योंकि शुद्धि नहीं होती है किंतु अगर आपको वह कंठस्थ हैं, तो आप उनका मनन और चिंतन अवश्य कर सकते हैं। विचार करिए आप चश्मा पहनते हैं और चश्मे के बिना पढ़ नहीं सकते हैं तो भी अगर कंठ में विद्या विराजमान है तो आप किसी भी स्थान पर किन्हीं भी परिस्थितियों में धर्म ध्यान कर सकते हैं।
-कर्म का मोबाइल और धर्म का मोबाइल, ऐसा नहीं है कि मोबाइल की उपयोगिता वर्तमान समय में नहीं है। आज के समय में बहुत सारे व्यापार से संबंधित कार्य जिन्हें हम षट्कर्म कहते हैं उसके लिए मोबाइल वर्तमान परिवेश में आवश्यक हो गया है, किंतु उसी मोबाइल के अंदर में आपने धवला जी, समय सार या अन्य धार्मिक ग्रंथों को डाउनलोड करके रखा हुआ है और आप उन्हें उसी मोबाइल को लेकर शौचालय में जाते हैं तो आप सोचिए आप कितने पाप कर्म बांध रहे हैं।
– वैराग्य कब आता है? विषय भोग से जब विरक्ति होने लगे तो यह संकेत वैराग्य के हैं। भोग का पिंजरा खोल कर जब पंछी मुक्त होने की भावना करने लगे तो यह वैराग्य है। संसार दुखों का कारण है और विषय भोग से सुख नहीं मिलता।
-साप्ताहिक सर्विसिंग कैसे करें? हम अपने शरीर से निरंतर कार्य ले रहे हैं। पाचन तंत्र निरंतर कार्य कर रहा है। प्रतिदिन हम भांति-भांति का अन्न (कार्बोहाइड्रेट), घी (वसा) और दाल(प्रोटीन) इत्यादि हम डाल कर पाचन तंत्र से बहुत परिश्रम करवाते हैं। सप्ताह में एक दिन आयुर्वेद के अनुसार हमें पेट को आराम देना चाहिए। उपवास अगर संभव ना हो तो फलाहार करें, जिससे हमारे भीतर जो विषाक्त इत्यादि एकत्रित हुए हैं वह भी दूर होंगे। जिससे हमारे शरीर की सर्विसिंग भी हो जाएगी और परिवार होटल इत्यादि जाने से भी बचेगा।
– लोग ऐसा करते हैं लोग वैसा करते हैं….लोगों को छोड़ दो तुम अपना लोटा छानो। दूसरों का लोटा छानने जाओगे तो लोग तुम्हारे लोटे में बगैर छना जल डालके चले जाएंगे।
-एक छंद रोज याद किया करो, गांठ में पैसा और कंठ में विद्या समय पर काम आती है, तिजोरी का पैसा और पुस्तक की विद्या समय पर काम नहीं आती।कभी स्थान शुद्ध नहीं मिला, कभी पुस्तक नहीं मिली। याद किया हुआ मन में पढ़ सकते हो।
-बाहर जाते हैं। मंदिर के दर्शन नहीं हो पा रहे हैं गाड़ी में हैं तो आंख बंद करके मंदिर की कल्पना करके बैठ जाओ। प्रभु का स्मरण-वंदन करो।
-जिस मोबाइल में शास्त्र हैं उसको लेकर शौचालय में जा रहे हैं, बिस्तर पर रखकर सो रहे हैं जबकि धर्म का एक कागज भी हम बिस्तर से दूर रखते हैं।
-हर प्रकार की अशुद्धि में मोबाइल साथ रखते हैं, अगर मोबाइल से धर्म करना है तो धर्म करने वाला मोबाइल अलग रख लो। जिससे सिर्फ धर्म करना उसमें और कुछ नहीं होना चाहिए।
-जितना ज्ञान का विनय करने से फल मिलता है उससे लाख गुना अशुभ फल ज्ञान का अविनय करने से मिलता है।
-आज निहार के लिए प्राकृतिक स्थान कहां मिलेगा… साधु की चर्या को तर्क से बदलने की कोशिश मत करो, पंचम काल के अंत तक साधु धर्म का पालन होता रहेगा। अंत तक मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका…सभी मिलेंगे।
-आज के बच्चों के 90, 95, 98 प्रतिशत देखके तो कांप जाते हैं…हम तो 33 नंबर आने पर पेड़े बांटते थे। सुबह दोपहर शाम पुस्तक पढ़ो- पढ़ो मत किया करो। पढ़ाई के अलावा बाकी विकास/धर्म नहीं हो पाता है, बच्चों को ज्यादा नंबर लाने का प्रेशर मत दो, डिप्रेशन में आ जाते हैं…. छोटी क्लास के परसेंटेज देखकर नौकरी नहीं मिलती।
-बच्चों आराम से पढ़ाई करो। कम नंबर आएं तो चिंता मत करो। तुम भी उसी क्लास में जाओगे जिसमें 99 प्रतिशत वाला जाएगा…स्कूल से आकर खूब धर्म करो।
-वैराग्य न तो पढ़ते-पढ़ते आता है, न ही लेने देने से आता है। जिस दिन विषय भोग की सामग्रियां विपरीत दिखने लग जाएं समझ लो वैराग्य है। भोग में आनंद न आए ऐसा लगने लगे कि ये कब छूटे कब छूटे…भोग का पिंजरा छोड़कर कब योग में चला जाऊं ऐसा विचार आने लगे तो समझना वैराग्य है।
-शिखर जी जाते हो तो रिटर्न टिकिट बनाके ले जाते हो, शिखर जी पराया घर है, वहां अपने घर जाने का पता होता है, लेकिन वापस शिखर जी कब जाओगे ये पता नहीं है।
-कल रविवार है। बहुत से घरों में कल खाना नहीं बनेगा, क्योंकि होटल जाना है…अरे तुम जैन हो जैनत्व की रक्षा करो। होटल जाना बंद करो…कम से कम दिवाली तक का तो त्याग कर ही दो।
– यदि स्वस्थ रहना चाहते हो तो एक दिन अपनी मशीन को आराम दो….उपवास मत करो…भूखे भी मत रहो। रविवार को फलाहार करो। घर की लक्ष्मी को एक दिन का आराम दो। अन्न नहीं खाना है,घी नहीं खाना है फल व ड्रायफ्रूट दिनभर खा सकते हो।













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