धन उतना ही रखना, जितना आवश्यक हो नहीं तो वही धन तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। यह बात आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने धर्म सभा में कही। पढ़िए राजेश जैन दद्दू
बड़ौत। धन कुछ तो है लेकिन सब कुछ नहीं है। धन, धरती जीने के साधन हैं पर वे भी साथ जाने वाले नहीं हैं, यहीं छूट जाएंगे। जीवन में उत्कर्ष प्राप्त करना है तो धन को नहीं, धर्म को श्रेष्ठ मानना। वर्तमान में देश परस्पर में क्यों लड़ रहे हैं ? मात्र धन और धरती की वजह से। शासकों की धन – धरती की चाह ही युद्धों की ओर धकेल रही है। सांप को कितना ही साथ में रखना, पर वह मौका देखकर डस ही लेगा। ऐसे ही धन उतना ही रखना, जितना आवश्यक हो नहीं तो वही धन तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा।
यह बात आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि लोग पहले धन कमाने के लिए दिन – रात एक करते हैं, अधिक – से अधिक धन कमाने के लिए, फिर अस्वस्थ होकर प्राण बचाने को डॉक्टर को धन देते हैं। जीवन में क्या किया? बाल्यकाल से यौवन काल पढ़ाई की क्योंकि धन कमाना था।
यौवन अवस्था धन कमाने में लगा दी और जब सुख के दिन आये तो रोगों ने घेर लिया, सो वृद्धावस्था दवाई खाते – खाते निकल गई। पूरा जीवन जोड़ने जोड़ने में व्यर्थ गुमा दिया। मित्र ! धन के अर्जन में दुख, धन की रक्षा में दुख। धन की चाह उतनी ही करो, जिससे जीवनोपयोगी सामग्री जुटा सको, पर धन के कमाने में पूरा जीवन मत लगा देना। मनुष्य बने हो, नर देह प्राप्त की है तो इसका वेदन करो, जीवन को सुखमय जियो।













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