चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी गुरुदेव की 152वीं जन्म जयंती के पावन अवसर पर अहमदाबाद में ससंघ विराजमान गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषण मति माताजी के पावन निर्देशन व सानिध्य में संघ चैत्यालय में श्रीजी के पंचामृत अभिषेक व शांति धारा के पश्चात चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी आचार्य का पंचामृत अभिषेक कर महा पूजा की गई। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर/ अहमदाबाद। चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी गुरुदेव की 152वीं जन्म जयंती के पावन अवसर पर अहमदाबाद में ससंघ विराजमान गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषण मति माताजी के पावन निर्देशन व सानिध्य में संघ चैत्यालय में श्रीजी के पंचामृत अभिषेक व शांति धारा के पश्चात चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी आचार्य का पंचामृत अभिषेक कर महा पूजा की गई। इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए आर्यिका श्री ने कहा कि आचार्य भगवन अडिग विश्वास के धनी थे।
ब्रिटिश गवर्नमेंट के समय जब जिन मंदिरों को सार्वजनिक आराधना स्थल घोषित कर दिया गया था, तब आचार्य भगवान शांति सागर जी ने 1105 दिन अनाज का त्याग कर दिया। आखिरकार सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और हाईकोर्ट से निर्णय हुआ कि जिन मंदिर जैनियों के ही आराधना स्थल हैं। उन्हीं का उपकार है कि आज हम अपने मंदिरों में पूजन-आराधना कर पाए रहे हैं।
आचार्य श्री ने दिगंबर संतों के विचरण पर प्रतिबंध होने पर भी अपनी चर्या से शासकों का मन द्रवित कर दिगंबर परम्परा को जीवन्त किया। आचार्य भगवान का श्रमण जीवन उत्कृष्ट श्रमणाचार्य तो गृहस्थ जीवन उत्कृष्ट श्रावकाचार था। गृहस्थ अवस्था में खेत पर जाते तो पक्षियों से पीठ करके बैठ जाते और दाने के साथ-साथ पानी की भी व्यवस्था कर देते थे। गुरु का संपूर्ण जीवन कथनी नहीं, कृतित्व से भरा पड़ा है।













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