एक संघनायक की जिस प्रकार सल्लेखना होती है, ठीक उसी प्रकार चारुकीर्ति जी की सल्लेखना हुई। श्रवणबेलगोला मठ के भट्टारक स्वतिश्री चारुकीर्ति जी महाराज की संल्लेखना समाधि के विषय में परम्पराचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपने विचार व्यक्त किए। पढ़िए विशेष रिपोर्ट…
श्रवणबेलगोला मठ के भट्टारक स्वतिश्री चारुकीर्ति जी महाराज की संल्लेखना समाधि के विषय में परम्पराचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि एक संघनायक की जिस प्रकार सल्लेखना होती है, ठीक उसी प्रकार चारुकीर्ति जी की सल्लेखना हुई, इस बारे में चर्चा भट्टारक प्रवर धवल कीर्ति जी महाराज के साथ मेरी हुई, उसी बारे में आपको बताने के लिए प्रस्तुत हूं।
बोले, मेरी जवाबदारी पूरी हुई
भट्टारक प्रवर ने कहा कि आज से कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मुझे बुलाया, चूंकि मैं 15 माह से यहां हूं, इसलिए एक-एक घटना मुझे पता है। अचानक चारुकीर्ति जी महाराज का फोन आता है कि आप तत्काल यहां आइये। जाने के बाद चारुकीर्ति महाराज ने कहा कि आप मुझे निवेदन पत्र लिखिए। (जैसा कि भट्टारक परम्परा के नियम हैं) कि आप अपने पद पर किसी को आरूढ़ करें। इन्होंने निवेदन पत्र लिखा। उसके बाद कनकगिरी के भट्टारक भुवन कीर्ति जी महाराज को बुलाया। उनको बुलाकर कहा कि आप इस पर अनुमोदना पत्र लिखें। उसके बाद कमंडल, पिंची और दंड को बाहर रखकर पूरी व्यवस्था पर ताले लगवाए। विचार पट्ट पर आगम कीर्ति जी महाराज को स्थापित किया। उसके बाद जिस दिन उनकी सल्लेखना हुई। सुबह जिनालय से आकर वंदना कर कुछ लोगों को बुलाया। उनमें से चार लोगों को खड़ा किया और आगम कीर्ति जी महाराज को चाबी देकर कहा कि मेरी जवाबदारी पूरी हुई।
नमोकार मंत्र सुनते हुए प्राण ज्योति का विलय
उनके पैरों में जो 2018 से अब तक दर्द था, न उन्होंने चिकित्सा कराई न किसी तरह का शिथिलाचार किया। बल्कि अन्न का त्याग कर तपस्या कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में मंदिर से आते समय जैसे ही उनका पैर मुड़ा और थोड़ी चोट लगी। तो उन्होंने सबसे पहले नमोकार मंत्र बोलते हुए अपने वस्त्र निकाल दिया, केवल अधोवस्त्र पास रखा। कहने का तात्पर्य है कि हमारे यहां अहलक अवस्था की व्यवस्था है, उसे दीक्षा नहीं कहेंगे क्योंकि वह गुरु के व्रत संस्कार के बाद होती है। जिस प्रकार के जीवन की उन्होंने कल्पना की कि मेरे द्वारा मुनि पद धारण करने के बाद ही सल्लेखना हो, लेकिन जब उन्होंने देखा कि अब समयावली शेष नहीं है तो उन्होंने अपने वस्त्र निकालने के बाद वहां खड़े लोगों को नमोकार मंत्र सुनाने को कहा। नमोकार मंत्र सुनते हुए उन्होंने सुबह के समय अपनी प्राण ज्योति का विलय किया। भट्टारक परम्परा में इस प्रकार की सल्लेखना अद्भुत है।
उनके काम सभी संघों का करेंगे मार्गदर्शन
उनके माध्यम से 48 मंदिरों का संचालन होता था। प्रतिदिन 48 मंदिरों को गाजे-बाजे के साथ द्र्व्य जाना और त्रिकाल पूजा होना उनके माध्यम से होता था। शास्त्र की बात करें तो अक्षराअभिेषेक के नाम पर 108 ग्रंथ प्रकाशित हुए। उसके अतिरिक्त धवला का पूर्ण प्रकाशन उन्होंने कन्नड़ में किया और सभी संघों में पहुंचा। कई ग्रंथों का प्रकाशन किया। उसके बाद गुरुओं की बात करें तो भारत का एक भी संघ ऐसा नहीं है जो यह कहे कि चारुकीर्ति महाराज ने हमारे संघ सेवा नहीं की। राष्ट्रीय बात करें तो भगवान बाहुबली के अभिषेक के बाद सैनिक कोष में दान राशि दी। 2019 में कर्नाटक में जब बाढ़ आई तो लोगों के खाने व रहने की व्यवस्था अपने मठ के माध्यम से की। औषधालय, गुरुकुल हर क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उनके आदर्श समस्त संघों के लिए मागदर्शन करें। अजातशत्रुता उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलकंरण रहा। मेरे ध्यान में 100-150 वर्ष के पहले पिच्छीधारी हैं जिनकी समाधि के उपरांत राष्ट्रीय सत्कार करते हुए सलामी दी गई। इस प्रकार के गौरव को उन्होंने प्राप्त किया।













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