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महिला दिवस पर विशेष : बागीदौरा की पांच युवतियां आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर बनीं मिसाल


आयु के ऐसे पड़ाव पर जहां युवा मन किसी भी दिशा में भटक सकता है और सांसारिक मोह माया अंदर तक जकड़े रहती है, उस समय आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर बागीदौरा राजस्थान की पांच युवतियों ने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।


जयपुर। उम्र के जिस पड़ाव पर सामान्य युवतियां या तो कॅरियर की चिंता में डूबी होती हैं या शादी करके गृहस्थी बनाने के सपने देखती हैं, उस उम्र में राजस्थान के बागीदौरा की पांच युवतियों ने अपनी सांसरिक इच्छाओं पर नियंत्रण की अनूठी मिसाल कायम की है। दिव्यांशी, मुदिता, अवधि, तिथि और विदुषी नाम की इन युवतियों की आयु अभी सिर्फ 19 से 23 वर्ष के बीच है और इस छोटी सी उम्र में इन्होंने आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा से आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया है। पांचों ने पिछले वर्ष ही यह व्रत लिया है।

पांचों युवतियां अभी जबलपुर में आचार्य श्री की प्रेरणा से चल रहे पूर्णायु आयुर्वेद चिकित्सालय व अनुसंधान विद्यापीठ से बीएएमएस यानी आयुर्वेद की पढाई कर रही है। इनका अंतिम लक्ष्य तो दीक्षा प्राप्त कर भव सागर से मुक्ति पथ पर आगे बढना है, लेकिन फिलहाल आचार्य श्री के निर्देश पर आयुर्वेद की पढाई कर रही हैं ताकि विश्व भर मंें भारत की अपनी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार कर सकें।

बचपन के संस्कारों ने दिखाया कमाल

इतनी सी उम्र में संयम के पथ पर कदम बढाना आसान काम नहीं है। इसके पीछे बचपन के संस्कार, परिवार की पृष्ठभूमि और स्वयं का संकल्प काम करत है। ये पांचों युवतियां इस मामले में सौभाग्यशाली रही हैं। दिव्यांशी और मुदिता आपस में बहन हैं, वहीं अवधि, तिथि और विदुषी भी आपसी रिश्तेदारी में बहनें हैं। दिव्यांशी ने बताया कि हम पांचों का परिवार धार्मिक संस्कारों से परिपूर्ण है और हमें बचपन से ही यह संस्कार मिले हैं कि सांसारिक मोह-माया से दूर रहते हुए संयम के पथ पर चलते हुए वास्तविक और स्थाई आनंद प्राप्त करना है।

दिव्यांशी के पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक है, वहीं मुदिता, अवधि, तिथि और विदुषी के पिता स्वयं का व्यवसाय करते हैं। परिवार में उनके अलावा उनके भाई-बहन भी हैं, हालांकि विदुषी इकलौती संतान हैं। दिव्यांशी स्वयं जबलपुर में आचार्य श्री की प्रेरणा से चल रहे प्रतिभास्थली में पढी हैं, इसलिए उनमें तो यह संस्कार ना सिर्फ परिवार से आए, बल्कि पढाई से भी आए, क्योंकि प्रतिभास्थली में तो पढाने वाले भी आजीवन व्रती ही हैं, लेकिन बाकी चारों तो बागीदौरा में सामान्य स्कूलों में ही पढी है और इनमें से मुदिता ने तो बीएस सी तक पढाई की है, यानी काॅलेज भी गई हैं, लेकिन यह परिवारों के संस्कारों का ही असर है कि इनमें संयम के पथ को छोड कर कोई दूसरा पथ अपनाने की इच्छा तक नहीं है।

कभी विकल्प आता ही नहीं

दिव्यांशी और मुदिता ने बताया कि यह सही है कि आज समय ऐसा है कि भटकाव बहुत आसानी से हो सकता है और हम भी मनुष्य ही है, इसलिए सांसारिक चीजें देखनी भी पडती है, लेकिन लेकिन संस्कार ऐसे हैं कि विकल्प आते ही नहीं है। आमतौर पर परिवार स्वयं बच्चों को ऐसे पथ पर आगे बढने से रोकते हैं, लेकिन हमारे परिवारों ने हमें कभी रोका नहीं बल्कि हमेशा प्रेरित किया। यही कारण है कि हम देखते सब कुछ है, लेकिन यह समझ भी है कि क्या सही है और क्या गलत है, इसलिए कभी कोई विकल्प दिमाग में आता ही नहीं है।

संतों का मिला सान्निध्य

परिवार के संस्कार ऐसे रहे हैं कि इन्हें हमेशा का संताों का सान्निध्य भी मिला। मुदिता ने बताया कि आचार्य श्री समय सागरजी महाराज, विज्ञानमति माताजी और आगम सागर जी महाराज के चातुर्मास बागीदौरा में हुए और इनके अलावा भी जो महाराज जी वहां आते रहे, उन सबके पास हम जाते थे, इसलिए प्रेरणा मिलती गई और संतों की चर्या को देखते हुए भाव प्रबल होते गए। आचार्य श्री विद्यसागर जी महाराज का सान्निध्य भी लगातार मिलता रहा तो भावना दृढ हो गई कि अब तो इसी पथ पर आगे बढना है।

 

नीट की परीक्षा पास की

दिव्यांशी ने बताया कि आचार्य श्री के निर्देश पर ही हमने नीट की परीक्षा दी और इसे पास करने के बाद आयुर्वेद की पढाई के लिए बीएएएमएस में प्रवेश लिया। आचार्य श्री का कहना है कि एलोपैथी नहीं बल्कि हमें भारत की अपनी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को आगे बढाना है। अब अभी तो पढाई कर रहे हैं और फिर जैसा आचार्य श्री निर्देश देंगे, उसी अनुरूप काम करेंगे।

अंतिम लक्ष्य दीक्षा है

इन सभी का अंतिम लक्ष्य दीक्षा है। इनका कहना है कि संयम का पथ पकडा है तो अंतिम लक्ष्य तक तो पहुंचना ही है। हमारे भाव तो दीक्षा के ही है ताकि आत्मकल्याण के पथ पर चलते हुए भवसागर से मुक्ति मिले, लेकिन देखेगे कि आचार्य श्री क्या निर्देश देते हैं। वे जैसा कहेंगे उसी के हिसाब से आगे चलेंगे। लेकिन यह तय है कि संयम का यह पथ कभी छोड़ना नहीं है।

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