मुनि श्री निरंजन सागर ने प्रवचन के दौरान कहा कि प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। पढ़िए जयकुमार जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की विस्तृत रिपोर्ट…
कुण्डलपुर। हर व्यक्ति आज चाहता है कि उसका नाम भी इतिहास में अंकित हो और वह भी सामान्य नहीं बल्कि स्वर्णिम अक्षरों में। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन ही स्वर्णमय बना लिया हो, उस व्यक्ति का जीवन ही स्वर्णिम अक्षरों से इतिहास में स्थान पाता है। जिस व्यक्ति ने अपने आप को स्वर्ण की भांति निखारा न हो, तपाया न हो, ऐसा व्यक्ति तीन काल में आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सकता है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी ने महाराज में प्रतिदिन होने वाले प्रवचनों की श्रंखला के दौरान कही। प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। यह कुछ ऐसी चाह है कि जब तक मुख से आह न निकले अर्थात प्राणांत होने तक बनी रहती है। इस चाह को स्वाहा किए बिना हम एक आदर्श पूर्ण जीवन नहीं जी सकेंगे। साइंस ऑफ लिविंग का रहस्य समझ में आना बड़ा कठिन है। जिसने ऐसे समझ लिया वही जीवन के सही आनंद को प्राप्त कर सकता है। जीवन का सार है मर्यादा और जिसने मर्यादा का उल्लंघन कर दिया, फिर वह किसी की मर्यादा अर्थात् विनय आदर आदि भी नहीं करता। पिता पुत्र की मर्यादा का आदर्श उदाहरण हैं श्रीराम और दशरथ जी। गुरु शिष्य की मर्यादा का आदर्श उदाहरण हैं एकलव्य और द्रोणाचार्य। देश प्रेम का आदर्श उदाहरण हैं दानवीर भामाशाह। राष्ट्रप्रेम का आदर्श उदाहरण हैं महाराणा प्रताप। अतिथि सत्कार का आदर्श उदाहरण हैं शबरी। भक्ति का आदर्श उदाहरण हैं मीरा। ऐसे कई गौरवशाली व्यक्तित्व से भारतीय सनातन इतिहास भरा पड़ा है। इन महापुरुषों ने अपने जीवन को सफल आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। इतिहास जब भी लिखा जाता है कुछ करने वालों का ही लिखा जाता है परंतु वह कार्य अगर आदर्श कार्य हो तो वह इतिहास को गौरवान्वित करता है और वही कुछ कुकृत्य ऐसे भी होते हैं जिनसे इतिहास कलंकित भी हो जाता है। रावण, कौरव आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे इतिहास को शर्मसार होना पड़ा।
वर्तमान में आदर्शों की कमी
वर्तमान समय में समाज में आदर्शों की बहुत बड़ी कमी होती जा रही है। यह हम सभी का प्रबल पुण्य का उदय है इस कलिकाल में जहां धर्म नाम मात्र का रह गया था, वहां आचार्य महाराज जैसे सूर्य का उदय हुआ। इस युग में आदर्श पुरुष राष्ट्रहित चिंतक आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर जी महामुनि राज का जन्म हुआ। जिन्होंने इस धर्म की ध्वजा को इतना ऊपर उठाया कि वह धर्म इस युग के अंत तक अनवरत इसी तरह चलता रहेगा।गुरुदेव ने अपने मर्यादित आदर्श पूर्ण जीवन के माध्यम से एक ऐसा गौरवशाली इतिहास रच डाला। ऐसा इतिहास ना भूतो ना भविष्यति। यह इतिहास युगों युगों तक गुरुदेव के गुणगान गा कर उनकी गौरवगाथा सबको सुनाता रहेगा। आचार्यों ने आदर्श पूर्ण जीवन जीने को कहा है। ऐसा जीवन जो बिना प्रदर्शन के मात्र आत्मदर्शन को दर्शाए, वही आदर्श जीवन है। आदर्श अर्थात (आ +दर्श) आत्मदर्शन जहां हो। ऐसा आदर्श हम सभी अपने जीवन में स्थापित करें और जिन्होंने किया है, उनका अनुकरण कर अपना जीवन सफल करें।













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