समाचार सम्मेदशिखर

आदिवासी,जैन समुदाय के संबंधों का ‘संक्रांति ‘काल मधुबन में आदिवासियों को जैनियों को गुड़ खिला मुंह मीठा करवाया

 

धनबाद उसी झारखंड में है, जहां सम्मेद शिखर की पवित्रता को लेकर जैन समाज चिंतिंत था और आदिवासी समाज के नेता इसे पारसनाथ पहाड़ी को हथियाने का मामला बता कर आदिवासी नेताओं को भड़का रहे थे। दोनों पक्षों में इतनी खींचता हो गई थी कि प्रशासन और दोनों समुदाय के प्रबुद्ध लोगों में चिंता पैदा हो गई कि जो संबंध राजनीति की भेंट चढ़ गए वो अब सामान्य कैसे होंगे ।

लेकिन कहते हैं कि अगर जहां चाह हो, वहां राह बन ही जाती है । जैन संतों से संयम, सत्य और अहिंसा का संदेश मिला और धनबाद के अनिल ने सम्मेद शिखर जी क्षेत्र में वो पहल कर दी, जिसका इंतज़ार था ।

अनिल, आदिवासियों के महाजुटान आयोजन में आदिवासी नेताओं की टकराव भरी वाणी से खिन्न थे. क्योंकि उन्होंनें ज़िंदगी भर देखा है कि कैसे आदिवासी और जैन श्रद्धालु मिल जुल कर पारसनाथ की सेवा कर रहे हैं ।

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि महाजुटान के बाद उनकी रातों की नींद उड़ गई क्योंकि उन्हें पता था कि अगर कुछ नहीं किया गया तो सम्मेद शिखर की पवित्रता का मुद्दा कहीं पीछे छूट जाएगा और क्षेत्र में जैन और अजैन के बीच संबंधों की खटास रोज़ नई परेशानियां पैदा करेगी ।

मकर संक्रान्ति पर क्षेत्र में आदिवासियों का बड़ा मेला भरता है । इसी मेले में आदिवासियों और जैनों के बीच संबंधों को सहज करने की कोशिश की गई । वो लिखते हैं –

*”कल रात चिंता से तबियत बिगड़ी हुई थी। एक बार तो हिम्मत जवाब दे दी थी।
भला हो भाई मनीष का वो मेरे साथ मधुबन आया।

कल रात उसने अपने कंधे पर उठा कर गाड़ी खाली की। किसी ने मदद नही की।सुबह पूजा अर्चना की ओर मैं बिना कुछ खाए-पिए, 8 बजे विमल सागर समाधि स्थल पहुंच गया। वहां कोई नहीं मिला।

फिर मैंने अपने सारे बैनर लगाए। फिर मैं लोगों को जागरूक करने लगा। पैंपलेट हैंड बिल लोगों को देने लगा। बहुत से लोगों में आक्रोश था, गलतफहमी थी ।

बहुतों से वाद विवाद भी हुआ। कुछ नेता धक्का देकर मुझे हतोत्साहित करने लगे। लेकिन आम आदीवासी समुदाय ने साथ दिया। मेरी सोच, पैंपलेट हैंड बिल को बहुत ही अच्छा बताया।

आज दिन भर में सिर्फ एक बार खाना नसीब हुआ। दिन भर खड़े होकर लोगों से बात करते करते गला खराब हो गया है। खड़े खड़े पैरों की हालत खराब है।

मगरसंतुष्टि हैं कि जो बीड़ा उठाया था। जैन, अ-जैन के आपसी सम्बन्ध में जो कटुता आई थी। उसे काफ़ी हद तक दूर में सफल हुआ।मधुबन जैन समाज के लोगों ने मेरे साथ मिलकर सहयोग देकर गुड़- चूड़ा तिलकुट खिलाकर सभी मूलवासी आदिवासी समुदाय का मुंह मीठा किया।

इसके लिए मधुबन समाज का बहुत बहुत धन्यवाद देता हूं। उसे आप सभी के परोक्ष सानिध्य , आशिर्वाद, शुभकामना हौसला अफजाई से पूरा किया। सभी का सहयोग मिला इसके लिए धन्यवाद आभार व्यक्त करता हूं। आज मुझे चैन से सफलता की नींद आयेगी.

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