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सम्मेद शिखर : संकट स्वयं बता रहा है समाधान की राह … , अंतर्मुखी श्री पूज्य सागर जी महाराज की कलम से

 

सम्मेद शिखर कथित संकट पर पूरे देश में बहस चल रही है । जैन समुदाय के लिए इससे बड़ा कोई तीर्थं नहीं हो सकता । जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों का महानिर्वाण इसी पावन धाम पर हुआ है । केन्द्र सरकार, राज्य सरकार के बीच उलझन हुई या फिर किसी अफवाह या गलत फहमी हुई ।

जो भी हुआ है, ये तो और विस्तार से समझना होगा लेकिन देश भर में जैन समुदाय की प्रतिक्रियाएं ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सम्मेद शिखर का सम्मान, जैन समाज के लिए आस्था ही नहीं, बल्कि उनका ह्दय स्थल में बसता है । दिल दुखता है तो परेशानी होती है।

सम्मेद शिखर को लेकर देश भर में बना माहौल बहुत कुछ कह रहा है । जैन ही नहीं, अलग-अलग धर्मों में तीर्थ स्थान, पवित्र स्थानों के संरक्षण के लिए बहस हो रही है । जब तक आधुनिक परिवेश और पंरपराएं साथ-साथ चलती रहती हैं, किसी को कोई समस्या नहीं होती लेकिन जैसे ही आधुनिक परिवेश परंपराओं पर चोट करता है, सभी सतर्क हो जाते हैं ।

ये समाज की चेतना जागने की प्रक्रिया अचानक नहीं होती है । कई कारणों से आहत समाज की चेतना, समय के साथ जन-जागृति में बदल जाती है । सम्मेद शिखर के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है ।

आप देश के विभिन्न सभी जगहों पर प्राचीन काल और इस समय की व्यवस्थाओं का अवलोकन करेंगे तो पाएंगे कि तीर्थ स्थलों की पवित्रता और शुद्धता का धीरे-धीरे क्षरण किया गया है । इस क्षरण के प्रति समाज संवेदनशील तो है, उसमें चिंता तो है लेकिन सामाजिक चेतना और जन-जागृति आनी शेष है ।

इसीलिए हमेशा ऐसे उदाहरण सामने आते हैं कि अलग-अलग धर्मों के सुधी वर्ग भी बदलाव के प्रति पहले उदासीन रहते हैं और जब स्थितियां बिल्कुल विपरीत होती दिखती हैं तो सुप्त समाज अचानक मानों अपनी गहरी तंद्रा तोड़कर आंदोलन करने लग जाता है ।

सरकार के अधिकारी तो कागजों पर योजना बनाते हैं लेकिन जनप्रतिनिधियों की भूमिका यही होती है कि कागजी योजनाओं और नोटिसों का जनता पर, समाज पर, अलग-अलग धर्म के लोगों पर क्या असर पड़ेगा, उसका पहले से आकलन करें । दुख की बात यह है कि न तो जनप्रतिनिधि और न ही समाज के प्रबुद्ध लोग, जन असंतोष के बिन्दुओं को सही समय पर समझ नहीं पा रहे हैं ।

कोई कुछ नहीं बोल रहा इसका मतलब ऐसा नहीं है कि विरोध नहीं है । विरोध न करना भी एक तरह का विरोध है । मूक रहना भी एक तरह का प्रतिकार है ।

जन सामान्य में कोई बात धीरे-धीरे घर करती है । मगर एक बार जब धारणा बन जाती है तो फिर आसानी से नहीं जाती क्योंकि ये धारणा, व्यवस्थाओं के प्रति धीरे-धीरे पनप रहे असंतोष के कारण उपजी है । सम्मेद शिखर पर हो रहा आंदोलन इसी की परिणिति है ।

किसी एक तीर्थ स्थान पर विभिन्न धर्मों और समाजों के बीच उपजे विवाद, आपस की राजनीति और अंर्तद्वंद्ध इतने प्रबल हो जाते हैं कि श्रद्धालू स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है । वहीं श्रद्धालू, जिसकी आस्था, उस तीर्थ स्थान की महिमा बनाए रखती है, उस तीर्थ स्थान की गरिमा बनाए रखती है, वहां की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को संचालित करती है ।

सम्मेद शिखर के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है । सरकार और कुछ हद तक समाज के प्रतिनिधियों ने ध्यान नहीं दिया कि सम्मेद शिखर की प्राकृतिकता और शुद्धता में साल-दर-साल कुछ परिवर्तन है । इस व्यवस्था में जाने-अनजाने श्रद्धालूओं ने भी अपनी सुविधानुरुप बदल कर लिए या बदलावों को स्वीकार कर लिया ।

जैसे पावन पर्वतराज पर पहले सिर्फ नंगे पैर पैदल ही चल कर जाना था । अब वाहनों के लिए भी रास्ते बन गए हैं । कच्चे पहाड़ पर पक्ता निर्माण हो गया । पुराना जमाना याद कीजिए जब कोई तीर्थ यात्रा पर जाता तो लोग फूल-मालाएं पहना कर विदाई देते थे और सकुशल लौट आने पर स्वागत करते हैं ।

ढ़ोल-नगाड़ों और शहनाइयों के साथ जुलूस निकाले जाते थे । इसके पीछे की मान्यता यह कि यह व्यक्ति सभी सांसारिक व्यवस्थाओं को पीछे छोड़कर ईश्वरीय तत्व के सहज दर्शन की अभिलाषा लिए जा रहा है । यात्रा की दुरुहता, विकटता को स्वीकार रहा है । इसे पता कि जिन निर्जन स्थानों में वो तीर्थाटन करने जा रहा है, वहां न सुविधाएं होंगी और न संसाधन । इसीलिए जीवन के उत्तरार्द्ध में ही तीर्थ यात्राएं होती थी ।

लेकिन अब तीर्थ यात्राओं में न उम्र की सीमाएं हैं और न ही संसाधनों की और न ही परंपराओं की ।

मैं इस आधुनिक दौर का विरोधी नहीं हूं मगर इतना कह रहा हूं कि आधुनिक दौर में अगर आपको सही रूप में आध्यात्मिक शांति चाहिए तो हर धर्म को अपनी पूजा पद्धति के अनुसार ही जीना होगा । तीर्थ पर जाना ये किसी को दिखाने के लिए नहीं बल्कि आत्मशांति की प्रक्रिया है ।

लोग ऐसा मान कर चल रहे हैं कि सम्मेद शिखर पर संकट है, पता नहीं क्या होगा लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ है । बात सिर्फ इतनी है कि अपने तीर्थ स्थानों पर भौतिक विकास चाहिए या आध्यात्मिक । केवल जैन धर्म में नहीं, हर धर्म में यह मान्यता है कि आत्मशुद्धि, आत्मदर्शन की प्रक्रिया में एकाकीपन जरूरी है ।

इसीलिए तो हमारे साधू-संत जंगलों में चले जाते थे । आत्मज्ञान, आत्मशुद्धि का रास्ता संसारिक सुख, सांसारिक रिश्ते-नातों से, सुख-दु:ख के भाव से विरक्त हो कर ही प्राप्त किया जा सकता है । अब बताइए, सम्मेद शिखर पर विकास क्यों चाहिए ? ये घूमने की जगह तो है नहीं, ये स्थान उदाहरण है कि कैसे इस जीवन में आत्म सुधार,आत्मशुद्धि की राह पर चला जाए ।

जैन तीर्थंकरों का जीवन इसका उदाहरण है । यह पावन तीर्थं बताता है कि इंसान अपने सदकर्मों और आत्मबोध से भगवान की तरह ही पूजा जा सकता है । अगर ऐसे स्थान पर आप पिकनिक मनाने, मोटर गाड़ियों में, हैलीकॉप्टर से आने-जाने का उपक्रम करेंगे तो ये रास्ता निश्चित रूप से आपको आत्ममंथन,आत्मशुद्धि के बजाए ज्यादा सांसारिकता ही दिखाएगा ।

जैन धर्म के धर्मावलंबियों को भी ये समझना होगा कि सम्मेद शिखर की कीर्ति और ख्याति इसकी आध्यामिकता की वजह से है । इससे न समझौता करें और न ही होने दें ।

इस विषय पर गहन मंथन के बाद कुछ सुझाव हैं जिन्हें समाज और सरकार दोनों को विचार करना चाहिए । मुझे लगता है कि सम्मेद शिखर, पारसनाथ की पर्वत श्रृंखलाओं में जैन समाज की आत्मा बसती है । आधुनिक होती इस दुनिया और हर वर्ग की नई पीढ़ी को यह समझाना होगा ।

झारखंड के स्थानीय निवासियों की नई पीढ़ी को इस कार्य में जोड़ना होगा । इसे आस्था का स्थल बनाए रखने के लिए जरूरी है कि इसके आस-पास बसे लोगों के लिए जैन समाज और सरकार मिलकर कुछ ऐसा करें कि सभी स्थानीय निवासी, भले ही वो जैन समुदाय से न भी हों ।

लेकिन सम्मेद शिखर की पवित्रता को बचाने की जब भी बात हो, सबसे अग्रिम पंक्ति में वो खड़े नज़र आएं । इसके लिए वहां के सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ऐसा माहौल बनाना चाहिए जो आध्यात्मिकता को पोषित करे । जैसे पारसनाथ, सम्मेद शिखर के आस-पास रह रहे वनवासियों के लिए जैन समाज और सरकार मिलकर ऐसे कुटीर उद्योग विकसित करें जो जैन परंपराओं के अनुकूल हो ।

जैन तीर्थस्थानों की पूजा में उपयोग में आने वाली सामग्री चंदन, अगरबत्ती, नारियल, चावल इत्यादि पदार्थों के लिए स्वयं सहायता समूह बनाकर घर-घर कुटीर उद्योग विकसित किए जाने चाहिए । इस तरह से पर्यावरण और विकास एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं । हमारे जैन समाज में तो ‘करूणादान’ को अत्यधिक महत्व दिया गया है ।

करुणादान का प्रावधान बताता है कि जैन समाज की गतिविधियां, सिर्फ जैन समुदाय नहीं बल्कि दीन-दुखियों की सेवा, उन्हें संबल देने व विश्वकल्याण के भाव से की जाती है । सम्मेद शिखर क्षेत्र के आस-पास पर्यटन नहीं बल्कि उद्यमिता और आध्यात्मिकता को साथ-साथ चलाया जा सकता है । इसके अलावा, वहां जैन स्टडी सेंटर विकसित किया जाए ।

आज भारत की पहचान सत्य,अहिंसा का संकल्प लेकर जीवन व्यतीत करने वाले समाज से है । दुनिया भर में अहिंसा का संदेश भारत की भूमि से ही पहुंचा है ।

ऐसे में सम्मेद शिखर के 20-30 किलोमीटर के दायरे में जैन नॉलेज-स्टडी कॉरीडोर बनाया जा सकता है । मगर इसे शिक्षा की मौजूदा पद्धति से न जोड़कर आध्यात्मिकता से जोड़ा जाए । यहां आने वाले लोग जैन धर्म के बारे में जाने, जैन धर्म की पंरपराओं का अध्ययन करें लेकिन यहां कोई कागजी डिग्री नहीं बल्कि आध्यात्मिकता का अनुभव मिले । क्या जैन समाज और सरकार ऐसे संस्थान विकसित नहीं कर सकते ?

इसके अलावा एक और सुझाव है जो कि जैन धर्म तक सीमित नहीं, देशव्यापी है । भारत की सार्वभौमिकता में सर्व धर्म समाहित हैं । जब धर्म और आस्था को कानूनी चश्मे से देखेंगे तो तस्वीर कुछ और बन जाती है । भारत के संवेदनशील और विविधता से भरे समाज में हर निर्णय कानून के जरिए हो सकता है लेकिन उसकी स्वीकार्यता हमेशा संदिग्ध ही रहेगी क्योंकि निर्णय में सर्वमान्यता का अभाव होता है ।

अदालत की चौखट पर हर व्यक्ति पक्षकार है, सर्वहितकारिता का भाव नहीं मिलेगा । मेरा सुझाव है कि केन्द्र सरकार को धार्मिक स्थलों के संरक्षण और धार्मिक पर्यटन को लेकर अलग से मंत्रालय विकसित करना चाहिए । अभी देश में पर्यटन विभाग और पुरातत्व विभाग हैं । दोनों मिलकर देश में पर्यटन की व्यवस्था को संचालित कर रहे हैं ।

लेकिन देश में धार्मिक और सामाजिक संकटों को दूर करने के लिए अनिवार्य है कि धार्मिक पर्यटन को लेकर मंत्रालय बनें । जिसमें हर धर्म के प्रबुद्ध लोग, समाजिक संगठन, केन्द्र और राज्य सरकार के प्रतिनिधि शामिल हों । जिस तीर्थ स्थान को विकसित करने की योजना लानी है । उस तीर्थ स्थल का संचालन कर रही समिति के सदस्यों व क्षेत्र के गणमान्य लोगों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो ।

तीर्थस्थान की मान्यताएं, पूजा पद्धति से लेकर परिवेश सब कुछ उसी अनुकूल बनाई जाए जैसी वहां की परंपराएं है । ऐसा होने से सरकार, प्रशासन और तीर्थ स्थान संचालन समिति, श्रद्धालू सभी की भावनाओं के अनुरुप काम हो सकेगा और अनावश्यक विवाद टाले जा सकेंगे ।

हमारे देश के लिए कहा जाता है विविधता में एकता, हिन्द की विशेषता । इस विशेषता का आनंद लीजिए । अगर आप पुष्कर जाएं, केदारनाथ जाएं या सम्मेद शिखर जाएं । वहां की संस्कृति से जुड़िए, वहां के परिवेश और परंपराओं का पालन कीजिए । आपको अलग आनंद आएगा ।

सोचिए, देश धार्मिक और जातीय विविधता तो हैं लेकिन भौतिक और सांस्कृतिक विविधता भी अपार है । अगर सभी जगह पिज्जा,केक की दुकानें खुल जाएंगी । सभी जगह मांस-मदिरा का सेवन होगा । सभी जगह मनवांछित संसाधन व सुविधाएं होंगी तो तीर्थ जाने की जरूरत ही कहां है । तीर्थ स्थान और पर्यटक स्थल में बुनियादी अंतर ही यही है कि तीर्थ स्थान पर आध्यात्मिकता का वास है और पर्यटक स्थलों पर सांसारिक जीवन का उल्लास । दोनों में मेल करेंगे तो खतरनाक ही साबित होगा ।

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