आलेख समाचार सम्मेदशिखर

श्री सम्मेदशिखर सिद्व क्षेत्र की है अचिंत्य महिमा - चौबीसों सिद्व भूमि जा उपर शिखर सम्मेद महागिरी भू पर, एक बार वंदे जो कोई ताहि नरक पशुगति नहीं होई

जयपुर. मनीष गोधा । पूरे भारत वर्ष का जैन समाज सड़को पर उतर कर प्रदर्शन कर रहा है ।आखिर क्या है जैन धर्म के झारखंड प्रान्त में स्थित सर्वोच्च सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेदशिखर की महिमा ? आखिर क्यों भारत का प्रत्येक जैन इस क्षेत्र को बचाने के लिये हर गांव शहर से लेकर भारत की राजधानी दिल्ली तक सड़को प्रदर्शन कर ज्ञापन दे रहा है ?

तीर्थराज सम्मेदशिखर को जैन सम्प्रदाय में सभी सिद्ध एवं अतिशय क्षेत्रों की सूची में प्रथम स्थान दिया गया है। जैन धर्म में इस क्षेत्र को शाश्वत भूमि की संज्ञा दी गयी है ।जैनागम में बताया गया है कि जब धर्म के अनुसार छठे काल का प्रारम्भ होगा और समूची सृष्टि पर प्रलय आ जायेगा तब भी इस पावन और पवित्र भूमि का अस्तित्व संसार में ज्यों का त्यों बना रहेगा।

इस तीर्थराज के कण-कण में सिद्धत्व की आभा एवं निर्वाण की ज्योति सदैव विद्यमान रहती है इसलिये जैन धर्म में इस क्षेत्र को प्राण की संज्ञा दी गयी है। इस क्षेत्र पर देव भी सदा वंदना के लिये आते रहते है। इस तीर्थराज की उंचाई 4579 फुट एवं क्षेत्रफल लगभग 25 वर्गकिलोमीटर है।

भारत में नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में जन्म लेने वाला प्रत्येक जैन अपने जीवन में कम से कम एक बार इस पर्वत की वंदना नंगे पांव पवित्र भावों से करने की वांछा रखता है। जयपुर से सम्मेदशिखर सिद्ध क्षेत्र की दो बार पैदल यात्रा करने वाले श्रावक श्री विद्यासागर यात्रा संघ जयपुर के प्रमुख मनीष चौधरी के अनुसार इस क्षेत्र से असंख्यात चौबीसी एवं अनंतानंत मुनीश्वरो ने कर्मनाश कर मोक्षपद प्राप्त किया है ।

वर्तमान चौबीसी के काल में यहां की 20 टोंको से 20 तीर्थंकरों के साथ 86 अरब 488 कोडाकोडी 140 कोडी 1027 करोड़ 38 लाख 70 हजार 323 मुनियों ने कर्मनाश कर मोक्ष पद प्राप्त किया है। ऐसे सभी पापों की निर्जरा करने वाले पावन तीर्थराज की वंदना करने से 33कोटि 234 करोड़ 74 लाख उपवास का फल प्राप्त होता है। आचार्यो ने लिखा है कि इस बारह योजन प्रमाण वाले सिद्ध क्षेत्र में भव्य राशि कैसी भी हो, अत्यन्त पापी जीव भी इसमें रहता हो, आता हो, बैठता हो अथवा जन्म लेता हो तो वह 48 भवोें मे नियम से कर्मो का नाश कर बंधन से मुक्त हो जाता है।

इस तीर्थराज की वंदना के लिये वस़्त्रों का विधान भी बताया है सफेद, लाल, पीले, हरे एवं काले वस्त्रों को पहनकर वदंना करने से क्रमशः मोक्ष, पुत्ररत्न, अपरिमित धन-धान्य, बैरभाव व चिंता मुक्ति तथा असाघ्य रोग से मुक्ति की प्राप्ति होना बताया गया है।
वर्तमान चौबीसी के द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ ने सर्वप्रथम तीर्थराज सम्मेदशिखर से मोक्षपद प्राप्त किया था तभी से कई चक्रवर्तियों ने संघ सहित इस पावन तीर्थराज की वंदना की है।

अजितनाथ भगवान के काल में सर्वप्रथम तीर्थ यात्रा करने वाले संगर चक्रवर्ती हुये है एवं उनके पश्चात मघवान् सनतकुमार आदि चक्रवर्ती बताये गये है। सन् 1927 में कार्तिक की अष्टाहनिका पर्व के पश्चात दक्षिण महाराष्ट्र से तीर्थराज की वंदना हेतु ससंघ विहार कर यात्रा पूर्ण की थी।

तब से आज तक इस क्षेत्र पर भारत के कई स्थानों से चतुर्विध संघ, मुनिराजों के संघ एवं आर्यिका माताओं के संघो के साथ कई बड़ी लम्बी दूरी की पदयात्राओं के माध्यम से इस क्षेत्र की वंदना करने श्रावक गण आते रहते है।

राजस्थान जैन सभा के मंत्री विनोद जैन कोटखावदा ने बताया कि झारखंड सरकार ने वर्ष 2019 में जैन धर्म के पावन क्षेत्र को पर्यटन स्थल बनाने की अधिसूचना जारी कर जैन धर्मावलंबियो की बिना सहमति और जानकारी के ऐसा धर्म विरोधी कार्य किया है जिसके चलते समस्त समूचा भारतवर्ष का जैन समाज यह आंदोलन कर रहा है उनका पूरे विश्व के जैन समाज का इस अधिसूचना रदद करने के लिये एक ही नारा है

तीर्थ बचाओ, धर्म बचाओ यही हमारा नारा
कण कण के सम्मेदशिखर पर है अधिकार हमारा

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