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संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति का नाम है वैराग्य – मुनि आदित्यसागरजी महाराज

इंदौर@राजेश जैन दद्दूकोई किसी का नहीं है। जब तक आयु है तब तक लौकिक, व्यावहारिक एवं पारिवारिक संबंध हैं। आयु खत्म होते ही सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति का नाम वैराग्य है। पंचेेंद्रीय विषयों के भोगों के प्रति आसक्ति एवं कर्मों का बंधन दुख का कारण है और कर्मों की निर्जरा होना सुख का कारण है।

यह उद्गार बुधवार को दिगंबर जैन पंचायती मंदिर छावनी में मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि भगवान की भक्ति जितनी विशुद्धि से होगी, उतनी अधिक कर्मों की निर्जरा होगी और भक्ति का फल भी प्राप्त होगा, लेकिन आज लोगों में भगवान के प्रति श्रद्धा-भक्ति, समर्पण और आकर्षण कम और संसार के संबंधों और शरीर के प्रति आसक्ति ज्यादा दिखाई दे रही है। इसलिए शरीर और संसार से आसक्ति कम कर आत्म चिंतन करो, कर्मों की निर्जरा होगी। धर्म सभा को मुनि श्री अप्रमितसागर जी महाराज ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर देवेंद्र सेठी, निर्मल कासलीवाल, राजेंद्र सोनी, डॉक्टर जैनेंद्र जैन, विकास जैन एवं राकेश जैन सहित अन्य समाजजन उपस्थित थे। सभा का संचालन पंडित भरत शास्त्री ने किया। प्रचार प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिश्री ससंघ का छावनी से विहार कर खातीवाला टैंक कॉलोनी पहुंचने पर समाज पदाधिकारी गोटूलाल जैन, अनिल जैन आदि ने पाद प्रक्षालन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। गुरुवार एवं शुक्रवार को मुनि श्री के प्रवचन दिगंबर जैन मंदिर, खातीवाला टैंक में होंगे।

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