समाचार

मुनिश्री सुदक्ष सागर जी का समाधि मरण

 

साबला । साबला स्थित दिगम्बर जैन संत भवन में परम पुज्य आचार्य सुंदर सागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सुदक्ष सागर जी महाराज ने विधिवत समाधि ली। 26 मई को सुबह 10.55 बजे उनका समाधि मरण हुआ। मुनिश्री की अंतिम यात्रा शाम 4 बजे निकाली जाएगी और अजित कीर्तिगिरी पर पहुंच कर मुनिश्री का अग्निसंस्कार किया जाएगा मुनिश्री को जनवरी में अपनी कैंसर की बीमारी का पता चला और उन्होंने अपने दीक्षा गुरू आचार्य सुंदर सागर जी महाराज से इलाज न कराने और समाधि मरण की बात कही। तभी से मुनिश्री की समाधि मरण की साधना चल रही थी। जिसके चलते मुनिश्री ने साबला गांव में 25 मई से चारों प्रकार के आहार त्याग दिया था।

क्या है सल्लेखना –
जैन धर्म में सल्लेखना का विशेष महत्व है। यह वीर मरण मृत्यु महोत्सव माना जाता है। जैन मुनि को 28 मूलगुणों का पालन करना होता है लेकिन जब वह अथवा उनका शरीर इन मूलगुणों के पालन में असमर्थ हो जाता है तो वह इच्छा पूर्वक सल्लेखना समाधि ग्रहण कर शरीर का त्याग करते है। दिगंबर जैन शास्त्र अनुसार इसे समाधि या सल्लेखना कहा जाता है, जिसे श्वेतांबर साधना पद्धति में संथारा कहा जाता है। सल्लेखना दो शब्दों से मिलकर बना है सत्+लेखना। इस का अर्थ है – सम्यक् प्रकार से काया और कषायों को कमजोर करना। यह श्रावक और मुनि दोनो के लिए बताई गई है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है, जिसके आधार पर व्यक्ति मृत्यु को पास देखकर सब कुछ त्याग देता है। जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र के सातवें अध्याय के २२ वें श्लोक में लिखा है: “”व्रतधारी श्रावक मरण के समय होने वाली सल्लेखना को प्रीतिपूर्वक सेवन करें।

https://youtube.com/shorts/igO_m82I4rE?feature=share

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
संपादक

About the author

संपादक

You cannot copy content of this page