सिद्धक्षेत्र बावनगजा से मंगल विहार कर आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी ससंघ का बड़वानी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। श्रद्धालुओं ने पाद प्रक्षालन, श्रीफल अर्पण और शोभायात्रा के साथ स्वागत किया। चातुर्मास में धर्म, स्वाध्याय और संस्कारों की अविरल धारा बहेगी। पढ़िए श्रीफल साथी दीपक प्रधान की यह रिपोर्ट।
बड़वानी। अंकलिकर परंपरा के चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज की शिष्या परम पूज्य आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी माताजी ससंघ का सिद्धक्षेत्र बावनगजा से मंगल विहार कर बड़वानी नगर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। दिगंबर जैन समाज ने श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ पाद प्रक्षालन, श्रीफल अर्पण एवं बैंड-बाजों के साथ मंगल अगवानी की।
श्रद्धा के साथ हुआ भव्य स्वागत
प्रातःकाल बावनगजा सिद्धक्षेत्र की वंदना के पश्चात आर्यिका संघ ने बड़वानी की ओर विहार किया। नगर सीमा पर समाजजनों ने रंगोलियों, मंगल गीतों और जयघोष के साथ स्वागत किया। बड़ी संख्या में युवा, महिलाएं एवं श्रद्धालु पदविहार में सहभागी बने। मंदिर पहुंचकर आर्यिका संघ ने भगवान के दर्शन किए तथा अभिषेक एवं शांतिधारा सम्पन्न हुई।
धर्मसभा में मिला चातुर्मास का संदेश
धर्सभा से पूर्व आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। महिला मंडल ने आर्यिका संघ को शास्त्र भेंट किए तथा समाज ने आचार्य श्री का पूजन संपन्न किया।
आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी माताजी ने कहा कि बड़वानी नगर अत्यंत पुण्यशाली है, जहाँ पूर्व में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज का चातुर्मास हुआ और अब आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के आशीर्वाद से पुनः मंगल चातुर्मास का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से चातुर्मास का शत-प्रतिशत लाभ लेने का आह्वान किया।
युवाओं, महिलाओं और समाज के लिए विशेष आयोजन
माताजी ने बताया कि चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन युवाओं की कक्षाएं, अभिषेक, प्रवचन, सामायिक, स्वाध्याय तथा महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक कक्षाओं का आयोजन होगा। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धा और समर्पण के साथ धर्म से जुड़ता है, वही वास्तविक पुण्य अर्जित करता है।
प्रेरणादायी संदेश
अपने प्रेरक उद्बोधन में माताजी ने कहा कि जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। चींटी की तरह निरंतर प्रयास करने वाला व्यक्ति अंततः सफलता प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु की शरण ही वास्तविक सुख और शांति का मार्ग है। जिनवाणी का श्रवण और संतों की सेवा अनेक भवों का कल्याण करती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि नगर में विराजमान साधु-संतों को श्रद्धापूर्वक आहारदान करें तथा गुरु, आगम और जिनवाणी में कभी भेदभाव न रखें। समन्वय, विनय और सेवा भाव से किया गया धर्मकार्य आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
समाज की रही सक्रिय सहभागिता
मंगल प्रवेश एवं धर्मसभा में समाज के युवा, महिला मंडल, वरिष्ठजन तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। पूरे नगर में चातुर्मास को लेकर उत्साह एवं धार्मिक वातावरण देखने को मिला।













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