मधुबन स्थित गुणायतन में राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ ध्वजारोहण एवं मंडप उद्घाटन के साथ हुआ। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को आत्मशुद्धि, विवेकपूर्ण श्रद्धा और धर्ममय जीवन का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी राजकुमार जैन अजमेरा की विशेष रिपोर्ट।
मधुबन (गिरिडीह)। अष्टान्हिका महापर्व के पावन अवसर पर गुणायतन में विराजमान राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज एवं मुनि श्री 108 संधान सागर महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ ध्वजारोहण एवं मंडप उद्घाटन के साथ श्रद्धा, भक्ति और उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि इस भव्य विधान में देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने 108 मंडलों के साथ आराधना प्रारंभ की।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि “श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान श्रद्धा, शुद्धि, सद्बुद्धि और सिद्धि की साधना का महापर्व है। यह केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मजागरण और आत्मपरिवर्तन का श्रेष्ठ माध्यम है।”
उन्होंने कहा कि विधान में अंधश्रद्धा नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण श्रद्धा आवश्यक है। अनेक लोग सांसारिक सफलता, समृद्धि एवं बाधाओं के निवारण की भावना से यह विधान करते हैं, जबकि इसका वास्तविक उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और जीवन का सकारात्मक रूपांतरण है। विधान की सफलता उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि साधक के जीवन में आए आध्यात्मिक परिवर्तन से मापी जानी चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में पंचपरमेष्ठी एवं नवदेवताओं की आराधना की जाती है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और तप ही मोक्षमार्ग के आधार हैं। यदि ये गुण जीवन में विकसित हो जाएँ तो साधक सिद्धि के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान से धन-वैभव के स्थान पर सद्बुद्धि की कामना करने का संदेश दिया।
ध्वजारोहण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक धार्मिक आयोजन का शुभारंभ ध्वजारोहण से इसलिए किया जाता है क्योंकि यह धर्म को जीवन में सर्वोच्च स्थान देने का संदेश देता है। ध्वज चारों दिशाओं से आने वाली हवाओं के साथ लहराता है, किंतु उसका ध्वजदंड अटल रहता है। इसी प्रकार परिस्थितियाँ कैसी भी हों, धर्म के प्रति श्रद्धा अडिग रहनी चाहिए।
उन्होंने सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बच्चा खंभे को पकड़कर उसके चारों ओर घूमता रहता है और खंभा नहीं छोड़ता तो गिरता नहीं, उसी प्रकार जो व्यक्ति धर्मरूपी आधार को नहीं छोड़ता, वह जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से विधान के दौरान भावों की पवित्रता बनाए रखने, धैर्य, सहयोग और प्रसन्नता के साथ आराधना करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि प्रारंभिक दिनों में व्यवस्था में कहीं कमी रह जाए तो उसे सहज भाव से स्वीकार करें और सामूहिक सहयोग से उसे दूर करें
उन्होंने गुणायतन एवं श्री सेवायतन की संपूर्ण टीम तथा स्वयंसेवकों की सेवाभावना की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे विराट आयोजन सामूहिक समर्पण और अनुशासन से ही सफल होते हैं। उन्होंने सभी सेवाधर्मियों एवं धार्मिक सेवाओं का सौभाग्य प्राप्त करने वाले परिवारों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
प्रवचन के उपरांत मुनिश्री के मंगल निर्देशन में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की विधिवत आराधना प्रारंभ हुई। अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर संपूर्ण गुणायतन परिसर मंत्रोच्चार, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास से गुंजायमान हो उठा।
कार्यक्रम में झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, गुजरात, उत्तरप्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, समाज के गणमान्यजन एवं धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।













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