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अनादि काल से अशुभ भावनाओं में रत जीव को शुभ भावनाएं अपनानी ही होंगी : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव


विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कहा कि जीव को अनादि काल से चली आ रही अशुभ प्रवृत्तियों को छोड़कर शुभ भावनाओं का अभ्यास करना होगा। उन्होंने धर्म, आत्मज्ञान और सद्भावना के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने जैन दर्शन के आधार पर संसार, भाव, कर्म और आत्मज्ञान का विस्तृत विवेचन करते हुए कहा कि अनादि काल से अशुभ भावनाओं में लिप्त जीव को शुभ भावनाओं का निरंतर अभ्यास करना ही होगा, तभी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।

शुभ भावनाओं का अभ्यास आवश्यक

गुरुदेव ने कहा कि मैत्री, प्रमोद, करुणा, सोलह कारण भावना तथा बारह अनुप्रेक्षाएं सभी शुभ भावनाएं हैं। इनका नियमित अभ्यास मनुष्य के स्वभाव को बदल देता है। जिस प्रकार निरंतर अभ्यास से कठिन कार्य भी सरल हो जाता है, उसी प्रकार शुभ भावनाओं का अभ्यास जीवन को धर्ममय बना देता है।

सभी धर्मों का सार बताया

उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्मों के गहन अध्ययन के बाद उन्होंने सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों का निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। किसी की निंदा न करना, लोभ, क्रोध और चिंता से दूर रहना, पराई संपत्ति और परस्त्री से बचना, परिश्रमी बनना तथा शत्रु को भी मित्र बनाने का प्रयास करना सभी धर्मों का साझा संदेश है।

भाव बदलेंगे तो भाग्य बदलेगा

कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य के भावों के अनुसार कर्मों का बंध होता है। शुभ भाव से शुभ कर्म और अशुभ भाव से अशुभ कर्म बंधते हैं। इसलिए जीवन का वास्तविक परिवर्तन बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भाव परिवर्तन से होता है। आत्मा और शरीर को भिन्न मानने से आत्मश्रद्धा एवं आत्मज्ञान का आरंभ होता है।

बालिका की जिज्ञासा का समाधान

वेबीनार में पुनर्वास कॉलोनी की बालिका ध्याना ने फैशन, नृत्य और धर्म के संबंध में प्रश्न किया। गुरुदेव ने कहा कि नृत्य शरीर के व्यायाम का माध्यम हो सकता है और धर्म आत्मा के विकास का साधन है, लेकिन फैशन के नाम पर हिंसात्मक एवं रासायनिक उत्पादों का उपयोग उचित नहीं है। उन्होंने प्राकृतिक एवं आयुर्वेदिक उपायों को अपनाने की प्रेरणा दी।

मंगलाचरण से हुआ शुभारंभ

कार्यक्रम का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री की रचना “बच्चों तुम निर्माता हो भावी भाग्य के…” कविता के माध्यम से किया। कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा द्वारा प्रदान की गई।

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