जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर भगवान श्री विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 जुलाई, आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर इंदौर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों और तीर्थ स्थलों पर महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ, निर्वाण पाठ एवं निर्वाण लाडू अर्पण सहित विविध पूजन-विधान होंगे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का संकलित और संपादित आलेख…
इंदौर। जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर भगवान श्री विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 8 जुलाई, आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर इंदौर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों और तीर्थ स्थलों पर महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ, निर्वाण पाठ एवं निर्वाण लाडू अर्पण सहित विविध पूजन-विधान होंगे। भक्तगण पूरे मनोयोग से अपने आराध्य के प्रति आस्था व्यक्त करेंगे।
जन्म से मोक्ष तक का दिव्य जीवन
भगवान विमलनाथ का जन्म अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश के राजा कृतवर्मा और रानी श्यामा देवी के घर माघ शुक्ल तृतीया को हुआ। इनका शरीर स्वर्ण वर्ण और चिह्न सूअर था। युवा होने पर इनका विवाह हुआ और कुछ समय राज्य संचालन किया। सांसारिक भोगों की नश्वरता को समझकर आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को इन्होंने दीक्षा ली। 2 माह के कठोर तप के बाद माघ कृष्ण चतुर्थी को इन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। अंततः सम्मेद शिखर जी के सुवर्णभद्र कूट से आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को ही इन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। इनकी आयु 60 लाख वर्ष पूर्व थी।
भगवान की दिव्य देशना, सिद्धांत और संदेश
भगवान विमलनाथ जी की देशना का केंद्र ‘आत्मा की निर्मलता’ था। उन्होंने बताया कि बाहरी कर्मकांड से नहीं, बल्कि अंतरंग की शुद्धि से ही मोक्ष संभव है। उनके उपदेशों में अपरिग्रह और संतोष को प्रमुख स्थान मिला, जिसके अनुसार जीवन में संग्रह की प्रवृत्ति ही दुखों का मूल है और इच्छाओं पर नियंत्रण ही सच्चा सुख है। उन्होंने मन, वचन, काय से किसी भी जीव को कष्ट न देने को अहिंसा और हितकारी वाणी को ही सत्य बताया। भगवान ने इंद्रियों पर नियंत्रण तथा आत्म-केंद्रित तप से कर्मों का क्षय होना समझाया और स्वयं 2 माह तक निराहार रहकर तप की महिमा बताई। सुख-दुख, लाभ-हानि, निंदा-स्तुति में सम रहना ही वीतरागता की ओर पहला कदम है, यह उनका समता भाव का संदेश था। आज भौतिकता और उपभोक्तावाद के युग में उनका ‘अपरिग्रह’ सिद्धांत बेहद प्रासंगिक है, जो सिखाता है कि बाहरी चमक-दमक से मन मलिन होता है, जबकि त्याग से आत्मा निर्मल होती है। डिजिटल युग में भी उनकी देशना विचारों के प्रदूषण को रोकने और मोबाइल-सोशल मीडिया का सीमित उपयोग करने को ही सच्चा ‘डिजिटल अनुशासन’ बताती है। क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषायों को जीतकर ही व्यक्ति विमल यानी निर्मल बन सकता है।
मोक्ष कल्याणक का महत्व
मोक्ष कल्याणक जैन धर्म का सबसे बड़ा उत्सव है क्योंकि, यह आत्मा की पूर्ण मुक्ति का प्रतीक है। इस दिन निर्वाण लाडू चढ़ाने की परंपरा यह दर्शाती है कि जैसे लाडू बंधनमुक्त होता है, वैसे ही आत्मा भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाती है। महामस्तकाभिषेक आत्मा के अभिषेक का प्रतीक है, जो हमें अपने दोषों को धोकर निर्मल बनने की प्रेरणा देता है। भगवान विमलनाथ जी का जीवन हमें सिखाता है कि निर्मलता सिर्फ नाम में नहीं, आचरण में होनी चाहिए। उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ही हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं।













Add Comment