वैशाली स्थित बिहार सरकार के प्राकृत भाषा संस्थान की लंबे समय से बंद शैक्षणिक गतिविधियां पुनः शुरू करने का निर्णय लिया गया है। जैन समाज ने इसका श्रेय मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के मार्गदर्शन एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रयासों को दिया है। पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू की यह रिपोर्ट।
इंदौर/वैशाली। भगवान महावीर स्वामी की जन्मस्थली वैशाली स्थित बिहार सरकार के प्राकृत भाषा शोध संस्थान की लंबे समय से बंद पड़ी शैक्षणिक गतिविधियों को पुनः प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया है। संस्थान में नियुक्तियां रुकने तथा प्रशासनिक कारणों से इसकी गतिविधियां लगभग ठप हो गई थीं। अब इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है।
समाज जागरूकता अभियान से मिली नई दिशा
राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू एवं संघ के प्रमुख राकेश जैन गोहिल ने बताया कि इस विषय को लेकर परम पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने समाज को जागरूक करते हुए प्रेरणा, आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन प्रदान किया। उनके आह्वान पर राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ ने देशभर में जनजागरण अभियान चलाया तथा बिहार के राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं संबंधित विभागों को विभिन्न स्थानों से ज्ञापन सौंपे गए।
बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय
राजेश जैन दद्दू ने बताया कि 16 जून को बिहार सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा जैन समाज के प्रतिनिधियों को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। बैठक में बिहार राज्य तीर्थ क्षेत्र कमेटी के मानद मंत्री पराग जैन की विशेष भूमिका रही। सर्वसम्मति से निम्न निर्णय लिए गए—
– संस्थान में रिक्त पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी।
– वर्तमान शैक्षणिक सत्र से संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियां पुनः प्रारंभ होंगी।
– प्राकृत भाषा के त्रैमासिक एवं छह माह के अल्पकालीन पाठ्यक्रम संचालित किए जाएंगे।
गुरुदेव का संदेश
जैन समाज के अनुसार इस उपलब्धि में परम पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज तथा मुनि श्री अभयसागर जी महाराज का विशेष मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि “प्राकृत भाषा हमारी मातृभाषा है। शोध संस्थान की गतिविधियों का पुनः प्रारंभ होना जैन समाज के लिए गर्व का विषय है। हालांकि जब तक यह संस्थान पूर्ववत स्थायी रूप से स्थापित नहीं हो जाता, तब तक समाज और राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ को जागरूकता बनाए रखनी होगी। शांति मत लेना।”
उन्होंने यह भी कहा कि जिन शासन एकता संघ के सतत प्रयासों से बोर्ड की बैठक में आवश्यक संशोधन संभव हो सके तथा इस अभियान को वर्ष की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बताया।
समाज में हर्ष का वातावरण
इस निर्णय पर वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन, अमित कासलीवाल, आनंद नवीन गोधा, मयंक जैन, टी.के. वेद, हंसमुख गांधी, डी.के. जैन (डीएसपी), श्रीमती पुष्पा कासलीवाल, श्रीमती मुक्ता जैन एवं श्रीमती रेखा जैन सहित अनेक समाजजनों ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने मुनि श्री सुधासागर जी महाराज, मुनि श्री अभयसागर जी महाराज तथा राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रयासों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे जैन समाज और प्राकृत भाषा के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
प्राकृत भाषा संरक्षण की दिशा में अहम कदम
समाज के प्रतिनिधियों ने विश्वास व्यक्त किया कि संस्थान की गतिविधियां पुनः प्रारंभ होने से प्राकृत भाषा के अध्ययन, शोध एवं संरक्षण को नई गति मिलेगी तथा आने वाली पीढ़ियों को जैन आगम एवं प्राचीन साहित्य के अध्ययन का बेहतर अवसर प्राप्त होगा।













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