विवाह को जैन परंपरा में केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि धार्मिक संस्कार माना गया है। युवा पीढ़ी को विवाह के आध्यात्मिक महत्व और गृहस्थ धर्म की जिम्मेदारियों को समझने का संदेश दिया गया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
बांसवाड़ा। जैन परंपरा में विवाह को केवल सामाजिक या पारिवारिक आयोजन नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना गया है। शिक्षक एवं गुरुभक्त शशांक जैन (आरा, बिहार) द्वारा साझा विचारों में विवाह के आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए युवा पीढ़ी को संस्कारयुक्त गृहस्थ जीवन अपनाने का संदेश दिया गया।
विवाह का धार्मिक महत्व
उन्होंने बताया कि विधिपूर्वक कन्या का पाणिग्रहण कर उसे अपने गृह ले जाना विवाह संस्कार कहलाता है। यह धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होने वाला संस्कार है, जिसके माध्यम से गृहस्थ धर्म में प्रवेश होता है। विवाहिता को धर्मपत्नी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह धर्म पालन में सहभागी बनती है।
परंपराओं का पालन आवश्यक
उन्होंने कहा कि विवाह के अवसर पर जिनेंद्र भगवान का अभिषेक एवं सिद्ध भगवान की विशेष पूजा की जाती है। पाणिग्रहण संस्कार के बाद सात दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है तथा इस अवधि में तीर्थयात्रा, गुरु दर्शन और धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न किए जाते हैं।
युवा पीढ़ी को दिया संदेश
शशांक जैन ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि जीवनभर की जिम्मेदारी और संस्कार का बंधन है। इसका प्रभाव दांपत्य जीवन के साथ-साथ आने वाली संतति के संस्कारों पर भी पड़ता है। इसलिए विवाह का निर्णय परिवार की सलाह और उचित आयु में गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए।
गृहस्थ धर्म का करें पालन
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि विवाह को केवल औपचारिकता न मानें, बल्कि इसे धर्म, मर्यादा और उत्तरदायित्व से जुड़ा संस्कार समझकर जीवनभर गृहस्थ धर्म का पालन करें। यही पारिवारिक सुख, सामाजिक संतुलन और संस्कारित समाज की आधारशिला है।













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