गलियाकोट पुनर्वास कॉलोनी में आयोजित प्रवचन में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने आत्मज्ञान, सम्यक दर्शन और आध्यात्मिक जीवन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
बांसवाड़ा। गलियाकोट पुनर्वास कॉलोनी में आयोजित धर्मसभा में सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी गुरुदेव ने जज कमल जी नाहर की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आत्मज्ञान, सम्यक दर्शन और आध्यात्मिक जीवन के महत्व पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया।
जिज्ञासा का समाधान
गुरुदेव ने कहा कि केवल निरीक्षण करने वाले को पाप बंध नहीं होता, जबकि दंड देने के साथ यदि दूषित भाव जुड़ जाए तो वही पाप बंध का कारण बनता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल रटकर अंक प्राप्त करना ज्ञान नहीं है, वास्तविक ज्ञान आत्मा को जानने में है।
आत्मज्ञान ही परमज्ञान
उन्होंने कहा कि आत्मा स्वयं ही अपना गुरु और स्वयं ही अपना शिष्य है। आकुलता से रहित आत्मा का सुख ही वास्तविक निराकुलता है। जो आत्महित को नहीं जानता, वह मोह में रहता है और मोह ही कर्म बंधन का प्रमुख कारण बनता है। आत्मज्ञान के बिना समस्त शिक्षा कुविद्या के समान है।
आध्यात्मिक ज्ञान का महत्व
कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। धर्म का पालन केवल भोग, धन या सांसारिक लाभ के लिए करना उचित नहीं है। आत्मज्ञान से साधक निष्कंप, धैर्यवान, वीर और गंभीर बनता है तथा सात प्रकार के भय से मुक्त होकर जीवन जीता है।
आत्मा अविनाशी है
उन्होंने कहा कि आत्मा अजर-अमर है। शरीर नष्ट हो सकता है, किंतु आत्मा का एक भी प्रदेश नष्ट नहीं होता। अग्नि, ताप अथवा किसी भी प्रकार की शक्ति आत्मा का विनाश नहीं कर सकती। सम्यक ज्ञान प्राप्त करने वाला विनीत शिष्य जीवन में स्थिरता और गंभीरता प्राप्त करता है।
मंगलाचरण एवं जानकारी
कार्यक्रम में मुनि श्री सुविज्ञसागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता “देखो देखो सर्वत्र देखो, तन को देखो, मन को देखो” के साथ मंगलाचरण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की जानकारी विजय लक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।













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