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आत्म कल्याण के लिए धर्म को जीवन में धारण करें :  आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में सत्कर्म के लिए किया प्रेरित


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शनिवार चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में बताया कि मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को समझने और अच्छे कर्म करने के लिए मिला है। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शनिवार चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में बताया कि मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को समझने और अच्छे कर्म करने के लिए मिला है। कर्म कैसे बंधते हैं?की विवेचना में आचार्य श्री ने बताया कि जब हम क्रोध करते हैं,अहंकार करते हैं,ईर्ष्या करते हैं,लोभ और मोह में रहते हैं तो बुरे कर्म बंधते हैं। सुरेश सबलावत,भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने आगे कहा कि सच्चे सुख प्राप्ति का मार्ग में भौतिक बाहरी वस्तुओं से मिलने वाला सुख हमेशा नहीं रहता। सच्चा सुख मन की शांति और आत्मा की पवित्रता में है। भगवान ने राग-द्वेष छोड़ा, अहंकार छोड़ा, और आत्मा को पूरी तरह शुद्ध किया। इसलिए उन्हें अनंत ज्ञान और शांति प्राप्त हुई। भगवान का समवसरण हमें आपसी प्रेम और सद्भाव का संदेश देता है। मन बहुत भटकता है। सच्ची साधना वही है जिसमें मन शांत और स्थिर रहे जो व्यक्ति सब कुछ जानने का घमंड करता है, वह सीख नहीं पाता।

विनम्र व्यक्ति ही आगे बढ़ता है साधु-संत कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहते हैं। उनका जीवन त्याग, तप और आत्मसंयम का उदाहरण है।जब जीव राग-द्वेष छोड़ता है, अच्छे विचार रखता है,और आत्मा को शुद्ध करता है,तब वह मोक्ष की ओर बढ़ता है। प्रवचन का मुख्य संदेश यही हे कि सभी जीवों से प्रेम करो। क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या छोड़ो। मन को शांत और पवित्र बनाओ।धर्म को जीवन में उतारो। आत्मकल्याण ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है।

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