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सद्गृहस्थ के चित्त की स्थिरता में वित्त की स्थिरता अनिवार्य : प्रकृति का नियम है कि जो निरंतर गतिशील है वही जीवित है


भारतीय मनीषा के इस यथार्थपरक श्लोक में जीवन का वह नग्न सत्य प्रतिध्वनित होता है, जिसे समाज प्रतिदिन देखता तो है, किंतु स्वीकार करने में संकोच करता है। संसार का व्यवहार प्रायः उसी व्यक्ति के प्रति आदर से भर उठता है जिसके पास अर्थ है, सामर्थ्य है, पुरुषार्थ है और अपने श्रम से अर्जित वैभव है। पढ़िए, सुनील सुधाकर शास्त्री का आलेख…


यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः,स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः,सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति।। ( नीतिशतक)

भारतीय मनीषा के इस यथार्थपरक श्लोक में जीवन का वह नग्न सत्य प्रतिध्वनित होता है, जिसे समाज प्रतिदिन देखता तो है, किंतु स्वीकार करने में संकोच करता है। संसार का व्यवहार प्रायः उसी व्यक्ति के प्रति आदर से भर उठता है जिसके पास अर्थ है, सामर्थ्य है, पुरुषार्थ है और अपने श्रम से अर्जित वैभव है। धनहीन व्यक्ति चाहे कितना ही ज्ञानी, सदाचारी और संस्कारित क्यों न हो, समाज की दृष्टि प्रायः उसकी ओर उपेक्षा से ही उठती है। यही कारण है कि भारतीय चिंतकों ने जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकृइन चार पुरुषार्थों में “अर्थ” को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है।

धन केवल सिक्कों का संचय नहीं, अपितु मनुष्य की कर्मशीलता, उसकी प्रतिभा, उसके पुरुषार्थ और उसकी उपयोगिता का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है। आलस्य जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। जो मनुष्य कर्म से विमुख होकर भाग्य के भरोसे बैठ जाता है, वह न स्वयं का उत्थान कर पाता है और न परिवार, समाज अथवा राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। प्रकृति का नियम है कि जो निरंतर गतिशील है वही जीवित है; ठहरा हुआ जल भी सड़ जाता है। इसलिए युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि वर्तमान युग केवल वंश, जाति अथवा कुलीनता से नहीं, अपितु योग्यता, कौशल और आर्थिक सामर्थ्य से सम्मान प्रदान करता है।

आज का समय प्रतिस्पर्धा का समय है। प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी क्षेत्र में दक्षता प्राप्त करनी होगी। शिक्षा केवल प्रमाणपत्र प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनोपयोगी कौशल अर्जित करने की प्रक्रिया होनी चाहिए। जो युवक अथवा युवती अपने भीतर श्रम की साधना, अनुशासन की दृढ़ता और कौशल की शक्ति उत्पन्न कर लेता है, वही समाज में सम्मानपूर्वक स्थापित हो पाता है। वर्तमान युग में धन के बिना एक कदम चलना भी कठिन हो गया है। भोजन, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, आवास, परिवहनकृजीवन का प्रत्येक पक्ष अर्थ पर आधारित है। यहां तक कि धर्म भी आज अर्थ के अधीन दिखाई देता है। मंदिरों का निर्माण, धर्मशालाओं की व्यवस्था, अस्पतालों की स्थापना, निर्धन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, साधु-संतों की वैयावृत्ति, तीर्थों का संरक्षण, अनाथों और पीड़ितों की सहायताकृइन सबके लिए धन आवश्यक है।

जैन श्रावक जीवन में भी अर्थ का विशेष महत्व स्वीकार किया गया है। त्याग और अपरिग्रह का उपदेश देने वाली परंपरा भी यह मानती है कि गृहस्थ के लिए न्यायपूर्ण धनार्जन आवश्यक है। पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में कहा थाकृ“वह श्रावक कौड़ी का भी नहीं है, जिसके पास कौड़ी भी नहीं है।” इस वाक्य में केवल धन की प्रशंसा नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन की यथार्थ आवश्यकता का संकेत है। निर्धनता यदि मनुष्य को परावलंबी बना दे, तो उसका धर्म भी संकट में पड़ जाता है। इसलिए श्रावक को चाहिए कि वह पुरुषार्थपूर्वक, न्याय और नीति के मार्ग पर चलते हुए अर्थाेपार्जन करे, ताकि उसका जीवन आत्मसम्मानपूर्ण और धर्माेपयोगी बन सके।

किन्तु भारतीय संस्कृति ने धनार्जन को कभी अनीति का पर्याय नहीं माना। धन तभी मंगलकारी है जब वह न्याय, नीति और परिश्रम से अर्जित हो। हिंसा, छल, भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय से अर्जित संपत्ति अंततः विनाश का कारण बनती है। जिस धन में पीड़ितों की आहें और निर्दाेषों का रक्त मिला हो, वह सुख नहीं दे सकता। इसी प्रकार देवताओं के निमित्त आया हुआ धन भी अत्यंत सावधानी का विषय है। शास्त्रों में उसे “निर्माल्य” की कोटि में माना गया है; उसका दुरुपयोग आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है। इसलिए धन के प्रति संयम, शुचिता और उत्तरदायित्व की भावना अनिवार्य है।

यदि मनुष्य नीति और परिश्रम से संपत्ति अर्जित करे तथा उसका उपयोग परोपकार और धर्म के कार्यों में करे, तो शास्त्र कहते हैं कि तीनों लोकों की संपत्ति भी पाप का कारण नहीं बनती। धन तब पुण्य का माध्यम बन जाता है जब उससे किसी भूखे को अन्न मिले, किसी रोगी को उपचार मिले, किसी निर्धन बालक को शिक्षा मिले, किसी तीर्थ का जीर्णाेद्धार हो, किसी साधु की वैयावृत्ति हो और किसी असहाय परिवार के जीवन में आशा का दीप प्रज्वलित हो। धन का सर्वाेच्च सौंदर्य उसके सदुपयोग में है।

इतिहास साक्षी है कि जिन लोगों ने अपने अर्जित वैभव को राष्ट्र और समाज के हित में लगाया, वे अमर हो गए। भामाशाह इसका सर्वाेत्तम उदाहरण हैं। उन्होंने अपनी समस्त संपत्ति राष्ट्ररक्षा के लिए समर्पित कर दी और महाराणा प्रताप के संघर्ष को नई शक्ति प्रदान की। यदि भामाशाह के पास धन न होता, तो उनका त्याग भी इतिहास में उस दिव्यता के साथ अंकित न हो पाता। अतः धन केवल निजी सुख का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला भी है।

आज प्रत्येक माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपनी संतानों को केवल डिग्रियों का बोझ न दें, बल्कि उन्हें इतना सक्षम, स्वावलंबी और कर्मठ बनाएं कि वे अपने पैरों पर दृढ़ता से खड़े हो सकें। उन्हें ऐसी शिक्षा मिले जो चरित्र भी दे और कौशल भी; संवेदना भी दे और सामर्थ्य भी। योग्य संतति ही परिवार की वास्तविक संपत्ति होती है। वही आगे चलकर समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होती है।

अतः आवश्यक है कि हम आलस्य का परित्याग करें, समय का सम्मान करें, अपने भीतर कर्मशीलता का तेज जगाएं और न्यायपूर्ण साधनों से धन अर्जित करें। ऐसा धन जो केवल तिजोरियों में बंद न हो, बल्कि समाज के कल्याण में प्रवाहित हो। ऐसा वैभव जो अहंकार न दे, सेवा का संस्कार दे। ऐसा अर्थ जो धर्म का पोषक बने, अधर्म का नहीं। तभी “यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः” का यह श्लोक केवल सामाजिक व्यंग्य न रहकर जीवन निर्माण का प्रेरक मंत्र बन सकेगा।

जेब अगर खाली होगी , तो फिर जिल्लत उठानी पड़ेगी।

कफ़न भी मुफ्त नहीं होगा, उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।।

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