रविवार को मातृदिवस है। इस मौके पर मां के प्रति भावनात्मक विचारों से ओतप्रोत कविता आज पढ़िए, -डॉ.जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ की कलम से…
बस बहुत हुआ माँ…
अब और किसी माँ की आँखों में
अपने कारण आँसू नहीं भराऊँगा।
अनादि काल से भटकते-भटकते
कितनी माताओं की गोदी उजाड़ी,
कितनों के हृदय में विरह बोया,
अब ऐसा जीवन नहीं बिताऊँगा।
कभी पुत्र बनकर जन्म लिया,
कभी बंधु, कभी स्वजन कहलाया,
पर मोह की इस मृगतृष्णा में
हर रिश्ता एक दिन छूट ही गया।
हे आत्मा!
कब तक यूँ ही संसार की गलियों में
ममता के बंधन ढोएगी?
कब तक जन्म-मरण की अग्नि में
अपना अस्तित्व खोएगी?
अब तो ऐसा पुण्य उदय हो,
ऐसी पावन पर्याय मिले,
मैं केवल एक ही पुत्र बनूँ
और मरुदेवी सी मात मिले।
जिसकी गोदी में वैराग्य खिले,
जिसकी वाणी में सम्यकत्व बहे,
जो पुत्र को संसार नहीं,
मोक्षमार्ग का पथिक कहे।
जिस माँ की आँखों में ममता हो,
पर मोह का अंधकार न हो,
जिसके आँचल की छाया में
राग-द्वेष का संचार न हो।
हे जिनवर!
अब ऐसी कृपा कर देना,
ममता भी हो, पर बंधन न हो,
जीवन में करुणा तो बहे,
पर संसार का स्पंदन न हो।
जब अंतिम श्वास निकट आए,
मन जिनवाणी में खो जाए,
और यह चंचल जीव अंत में
सिद्धालय का पथ पा जाए।
-डॉ.जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’













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