जैन पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल दशमी का दिन जैन जगत में एक ऐतिहासिक और अत्यंत पवित्र अवसर के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 26 अप्रैल को 24वें और वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर श्रवण भगवान महावीर स्वामी का ‘ज्ञान कल्याणक’ महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल कासंकलित-संपादित आलेख…
इंदौर। जैन पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल दशमी का दिन जैन जगत में एक ऐतिहासिक और अत्यंत पवित्र अवसर के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 26 अप्रैल को 24वें और वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर श्रवण भगवान महावीर स्वामी का ‘ज्ञान कल्याणक’ महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह वह पावन दिन है, जब 12 वर्ष से अधिक की कठोर तपस्या के पश्चात वर्धमान महावीर ने अपनी आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचाना और उन्हें अनंत ज्ञान (केवलज्ञान) की प्राप्ति हुई।
धर्मग्रंथों का विशेष आध्यात्मिक महत्व और मंत्र
जैन आगम और विशिष्ट धर्मग्रंथों में भगवान महावीर की वीतरागता और उनके ज्ञान को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रूप में वर्णित किया गया है। ज्ञान कल्याणक के इस विशेष अवसर पर जिनागम का यह परम ‘आध्यात्मिक कोड’ या शाश्वत सूत्र संपूर्ण मानवता के लिए एक संजीवनी है।
परस्परोपग्रहो जीवानाम’ (तत्त्वार्थ सूत्र- 5.21)
अर्थात, सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए ही हैं। यह सूत्र ब्रह्मांड के इको-सिस्टम और अहिंसा का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कोड है। इसके साथ ही, ज्ञान कल्याणक के दिन अष्टद्रव्य से पूजा करते समय इस विशेष मंत्र का उच्चारण वातावरण को अत्यंत ऊर्जामयी और पवित्र बना देता है।
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं श्री वर्धमान जिनेंद्राय, केवलज्ञान-महिमंडिताय नमः, ज्ञान कल्याणक अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।’’
दिगंबर जैन मंदिरों में गूंजेंगे भक्ति के स्वर
ज्ञान कल्याणक के शुभ अवसर पर देश-दुनिया के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में भव्य अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। श्रावक-श्राविकाएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर वीतरागी प्रभु की आराधना में लीन हो जाते हैं। इस दिन की मुख्य गतिविधियों में शामिल हैं।
शांतिधारा और जिनाभिषेक- वैदिक और आगम मंत्रोच्चार के बीच भगवान की मनोहारी प्रतिमा का जल और प्रासुक द्रव्यों से अभिषेक, तथा विश्व शांति की मंगल कामना के साथ ‘शांतिधारा’ की जाती है।
महावीर विधान और महापूजन- श्रावक-श्राविकाएं अष्टद्रव्यों (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल) से भगवान की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और विधान मंडल पर अर्घ्य समर्पित करते हैं।
शास्त्र स्वाध्याय- जैन धर्मग्रंथों (जैसे समयसार, तत्त्वार्थसूत्र) का वाचन और गुरु भगवंतों के मंगल प्रवचन होते हैं।
ऋजुकूला के तट से समवशरण की दिव्य ध्वनि तक
जैन ग्रंथों के अनुसार 12 वर्ष, 5 महीने और 15 दिन की घोर तपस्या के बाद वैशाख शुक्ल दशमी के दिन जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी के तट पर एक शाल वृक्ष के नीचे भगवान महावीर को ‘केवलज्ञान’ प्रकट हुआ था। उनके चारों घातीय कर्मों का पूर्णतः नाश हो गया था और वे सर्वज्ञ बन गए। केवलज्ञान प्राप्ति के पश्चात सौधर्म इंद्र और कुबेर द्वारा भव्य ‘समवशरण’ (ईश्वरीय सभा) की रचना की गई। इसी समवशरण में भगवान महावीर की ‘दिव्य ध्वनि’ (ओंकार रूपी उपदेश) खिरी। इस दिव्य ध्वनि की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें बिना किसी भेदभाव के मनुष्य, देव और तिर्यंच (पशु-पक्षी) सभी ने उनके वचनों को अपनी-अपनी भाषा में समझा।
युगों-युगों के लिए प्रासंगिक संदेश
भगवान महावीर का ज्ञान कल्याणक मात्र एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के परम प्रकाश की ओर जाने का एक जीवंत मार्ग है। उन्होंने अपनी दिव्य ध्वनि के माध्यम से विश्व को जो सिद्धांत दिए, वे आज के अशांत समय में और भी अधिक प्रासंगिक हैं।
अहिंसा-मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाना। जियो और जीने दो का मूल आधार।
अनेकांतवाद- वैचारिक सहिष्णुता और दूसरों के दृष्टिकोण (नय) का सम्मान करना।
अपरिग्रह-भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह और मूर्छा का त्याग कर अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना।
ज्ञान कल्याणक का मूलतःसार
भगवान महावीर का ज्ञान कल्याणक हमें स्मरण कराता है कि सच्ची शांति और सच्चा ज्ञान बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही विद्यमान है। 26 अप्रैल को जब हम इस पावन दिवस को मनाएं तो हमारा प्रयास केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित न रहे। आइए, इस ज्ञान कल्याणक पर हम अपने अंतर्मन के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर सम्यक् ज्ञान के प्रकाश से अपने जीवन को आलोकित करने का संकल्प लें। जय महावीर! जय जिनेंद्र!













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