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मध्यान्ह में हुआ केवलज्ञान कल्याणक : पंचकल्याणक स्थल पर मुनि वृषभसागर महाराज की इक्षुरस से आहारचर्या संपन्न


 पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के पाँचवें दिवस रविवार को प्रातःकाल मुनि श्री वृषभसागर महाराज की आहारचर्या संपन्न हुई तथा मध्यान्ह में केवलज्ञान कल्याणक का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। विदिशा के शीतलधाम के अधिष्ठाता बर्रो वाले बड़ेबाबा भगवान आदिनाथ के नए मंदिर में विराजमान प्रतिमाओं एवं बेदी प्रतिष्ठा सहित सभी नवीन जिनबिंबों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का यह भव्य आयोजन जैन महाविद्यालय परिसर में संपन्न हो रहा है। पढ़िए अविनाश जैन की रिपोर्ट…


विदिशा। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के पाँचवें दिवस रविवार को प्रातःकाल मुनि श्री वृषभसागर महाराज की आहारचर्या संपन्न हुई तथा मध्यान्ह में केवलज्ञान कल्याणक का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। विदिशा के शीतलधाम के अधिष्ठाता बर्रो वाले बड़ेबाबा भगवान आदिनाथ के नए मंदिर में विराजमान प्रतिमाओं एवं बेदी प्रतिष्ठा सहित सभी नवीन जिनबिंबों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का यह भव्य आयोजन जैन महाविद्यालय परिसर में संपन्न हो रहा है। यह आयोजन संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज तथा विद्यानिधि आचार्य श्री समयसागर महाराज के आशीर्वाद और निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज, मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज एवं मुनि श्री संस्कार सागर महाराज के सान्निध्य में चल रहा है। प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया सम्राट एवं तरुण भैया, इंदौर के निर्देशन में सभी धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न कराई जा रही हैं।

रविवार प्रातः 6 बजे से मांगलिक क्रियाएँ प्रारंभ हुईं तथा प्रातः 8:30 बजे मुनि श्री वृषभसागर महाराज की आहारचर्या सम्पन्न हुई। लगभग 400 दिनों के उपवास के उपरांत संपन्न हुई इस आहारचर्या में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने पूर्ण शुद्धता और श्रद्धाभाव के साथ इक्षुरस (गन्ने का रस) से आहार दान दिया। हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस और राजा सोम के पात्रों द्वारा नवधा भक्ति के साथ पढ़गाहन किया गया।

इस अवसर पर निर्यापक मुनि श्री संभवसागर महाराज एवं मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने भगवान ऋषभदेव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए बताया कि दीक्षा के पश्चात प्रभु ने छह माह तक योग निरोध कर कठोर तपस्या की। जब वे आहार के लिए नगर में निकले, तब उस समय लोगों को जैन मुनिराज को आहार देने की विधि का ज्ञान नहीं था। लोग श्रद्धावश हाथी, घोड़े, सोना-चाँदी आदि भौतिक वस्तुएँ अर्पित करते थे, किंतु मुनिराज भौतिक वस्तुओं से विरक्त होने के कारण उन्हें स्वीकार किए बिना आगे बढ़ जाते थे।

इस प्रकार प्रभु नगर-नगर विहार करते हुए सात माह नौ दिन तक निराहार रहे। अंततः हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस और राजा सोम को जातिस्मरण से ज्ञान हुआ और उन्होंने नवधा भक्ति के साथ शुद्ध इक्षुरस से प्रभु को आहार अर्पित किया। इसी ऐतिहासिक घटना का प्रतीकात्मक आयोजन पंचकल्याणक महोत्सव में किया गया।

मध्यान्ह में मुनि संघ के सान्निध्य में विधीनायक प्रतिमा सहित सभी प्रतिमाओं पर अंकन्यास एवं कैवल्यज्ञान विधि मंत्रोच्चार के साथ संपन्न कराई गई। शुभ मुहूर्त में भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति का विधान किया गया। इस अवसर पर कृत्रिम समवसरण की रचना भी की गई, जिसमें देव-देवियाँ विमान से उतरकर तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की पूजा करते हुए दर्शाए गए।

समवसरण में गणधर रूप में निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज, मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज तथा मुनि श्री संस्कार सागर महाराज विराजमान हुए और उपस्थित श्रावकों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। सांयकाल प्रमुख पात्रों द्वारा समवसरण की आरती संपन्न की गई।

16 मार्च, सोमवार को प्रातः 6 बजे से मांगलिक क्रियाएँ प्रारंभ होंगी। प्रातः 6:45 बजे कैलाश पर्वत से भगवान का मोक्षकल्याणक विधान किया जाएगा। इसके पश्चात प्रमुख पात्रों एवं इंद्र परिवार द्वारा मोक्षकल्याणक की पूजन, विश्व शांति हेतु हवन तथा पूर्णाहुति संपन्न होगी।

इसके बाद प्रातः 9 बजे गज एवं रथ के साथ श्रीजी की भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। शोभायात्रा के उपरांत नए मंदिर में बेदी प्रतिष्ठा के साथ बर्रो वाले बाबा भगवान श्री आदिनाथ स्वामी सहित सभी प्रतिमाओं का मस्तकाभिषेक किया जाएगा। विश्व शांति के लिए शांतिमंत्रों के साथ शांतिधारा होगी तथा मुनि श्री की देशना के साथ छह दिवसीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव का समापन किया जाएगा। अंत में कार्यकर्ताओं का सम्मान एवं आभार प्रदर्शन किया जाएगा।

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