पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तृतीय दिवस प्रातःकालीन बेला में तीर्थंकर भगवान का जन्म कल्याणक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जैसे ही अयोध्या नगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरुदेवी के यहां तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, देवराज इंद्र का आसन कम्पायमान हो उठा और तीनों लोकों में आनंद की लहर छा गई। पढ़िए अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ की विशेष रिपोर्ट…
विदिशा। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तृतीय दिवस प्रातःकालीन बेला में तीर्थंकर भगवान का जन्म कल्याणक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जैसे ही अयोध्या नगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरुदेवी के यहां तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, देवराज इंद्र का आसन कम्पायमान हो उठा और तीनों लोकों में आनंद की लहर छा गई। राजा नाभिराय ने अपने राज्य में उत्सव मनाने का आदेश दिया, वहीं स्वर्ग के प्रमुख सौधर्म इंद्र ने कुबेर का खजाना खोल दिया और चारों ओर रत्नों की वर्षा होने लगी। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तीसरे दिवस प्रातः 6 बजकर 18 मिनट पर जैसे ही तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, अयोध्या नगरी बने पांडाल में उपस्थित प्रमुख पात्रों और इंद्र-इंद्राणियों में खुशी की लहर दौड़ गई। प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय भैया ने इसकी घोषणा की। इस अवसर पर राजा नाभिराय द्वारा किमिच्छिक दान की घोषणा की गई। साथ ही हथकरघा के सभी वस्त्रों पर 25 प्रतिशत छूट देने की घोषणा हुई तथा जीवदया के निमित्त गौशाला के लिए दान की घोषणाएं भी की गईं।
शहर में निकली भव्य शोभायात्रा
कार्यक्रम के अंतर्गत शहर में विशाल शोभायात्रा निकाली गई। इसमें सौधर्म इंद्र बालक आदिकुमार को ऐरावत हाथी पर लेकर गाजे-बाजे के साथ नगर भ्रमण पर निकले। उनके साथ पंचकल्याणक महोत्सव के सभी प्रमुख पात्र अश्व रथों पर अपने परिवार के साथ सवार थे। शोभायात्रा जैन महाविद्यालय से प्रारंभ होकर तिलक चौक, माधवगंज और अस्पताल रोड होते हुए पुनः अयोध्या नगरी पहुँची। यहाँ पांडुक शिला पर बालक आदिकुमार का अभिषेक किया गया।
मुनि श्री ने बताई भगवान आदिनाथ की महिमा
इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि जब अयोध्या नगरी में भगवान का अवतरण हुआ तो संपूर्ण विदिशा नगरी उल्लास में डूब गई। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी परिवार में बालक के जन्म पर अपार खुशी होती है, उसी प्रकार तीनों लोकों के नाथ आदि प्रभु के जन्म पर हमारा हर्ष भी असीम होना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि यह पंचकल्याणक कार्यक्रम हमारे इष्टदेव बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ को समर्पित है। उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ ने मानव समाज को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्पकला जैसे षट्कर्मों का ज्ञान देकर मानव सभ्यता को दिशा दी। उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों की शिक्षा देकर मानव जीवन को पूर्णता प्रदान की। भारतीय संस्कृति के चार आश्रमों — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास — के महत्व को बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को जीवन के प्रत्येक चरण का संतुलित रूप से पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आजकल लोग वानप्रस्थ की भावना को भूल रहे हैं, जिससे परिवारों में तनाव बढ़ रहा है।
बर्रो वाले बाबा का नया जिनालय
मुनि श्री ने बताया कि वर्ष 2008 में गुरुदेव ने बर्रो वाले बाबा की प्रतिमा की अगवानी की थी। प्रतिमा को देखकर उन्होंने कहा था कि यह अत्यंत अतिशयकारी प्रतिमा है और इसके लिए एक भव्य जिनालय बनना चाहिए, जो हजारों वर्षों तक जीवंत रहे। इसी भावना से प्रेरित होकर अशोक जैन (सागर वाले) एवं मोहन जैन नमकीन द्वारा बर्रो वाले बाबा का भव्य पाषाण मंदिर निर्माण कराया गया, जिसमें आज भगवान आदिनाथ नए आसन पर विराजमान हुए। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने पुण्य की महिमा बताते हुए कहा कि जीवन में मिलने वाली हर सफलता — चाहे वह शिक्षा हो, व्यापार, नौकरी, विवाह या संतान का सुख — सब पुण्य के प्रभाव से ही प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज के शिष्य बनने का अवसर भी पुण्य का ही फल है।
शनिवार को दिखाए जाएंगे वैराग्य के दृश्य
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि पंचकल्याणक के चतुर्थ दिवस 14 मार्च को प्रातः राजपाट तथा मध्याह्न में स्वर्ग की अप्सरा नीलांजना के नृत्य के माध्यम से संसार की असारता का दृश्य प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद राजकुमार आदिकुमार को वैराग्य उत्पन्न होता है और वे दीक्षा लेकर घोर तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं।













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