समाचार

जैसी भावना करते हैं वैसा भवितव्य बनता है: श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ के तीसरे दिन भगवान की शांतिधारा, अभिषेक किया 


नगर के सेक्टर 7 आवास विकास कॉलोनी सिकंदरा स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में गुरुवार को श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ के तीसरे दिन भगवान की शांतिधारा, अभिषेक किया गया। आगरा से पढ़िए, राहुल जैन की यह रिपोर्ट…


आगरा। नगर के सेक्टर 7 आवास विकास कॉलोनी सिकंदरा स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में गुरुवार को श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ के तीसरे दिन भगवान की शांतिधारा, अभिषेक किया गया। साथ ही इंद्र-इंद्राणी सहित विधान के प्रमुख पात्रों ने संगीतमय स्वरलहरियों के साथ अशोक जैन निर्मला जैन परिवार ने पूजा अर्चना की। विधान के 64 अर्घ्य समर्पित किए। बाल ब्रह्म्चारी पीयूष शास्त्री ने बताया कि संसार समुद्र से पार होने में दो मार्ग आगम में कहे गए हैं। निवृति रूप और प्रवृति रूप अथवा त्याग रूप और भक्ति रूप, निवृति रूप, त्याग रूप जहां महाव्रतियों के लिए बताया है, वहीं देव पूजा-गुरुपास्ती, स्वाध्याय, संयम, तप, दान अनुव्रतियों अथवा श्रावकों के लिए बताया है।

दान और पूजा दो मुख्य कर्म श्रावकों को अवश्य करने चाहिए

जो प्रवृति रूप भक्ति रूप है। दान और पूजा दो मुख्य कर्म श्रावकों को अवश्य करने चाहिए। इसीलिए जैन धर्म के जातक सभी नित्य प्रति देवदर्शन और पूजा करके अपनी भक्तिपूर्वक सर्वज्ञ के चरणों में समर्पित होते हैं और यही भावना भाते है कि हे! जिनेंद्र देव जिस प्रकार आपने अपने आठ कर्माें का नाश करके इस जन्म-मरण के चक्कर से अपने आप को सदा-सदा के लिए मुक्त कर अपने निज स्वरुप को प्राप्त किया है और अनंत, ज्ञान, दर्शन और आनंद में विराजमान हुए हैं। हम भी आपके गुणों को स्मरण कर अपने स्वरूप को प्राप्त करंे। जैन धर्म चूंकि भावना प्रधान है। सहज साधना की चर्या का परमोत्कृष्ट रूप मुनि दीक्षा है। जैसी भावना हम करते हैं। वैसा हमारा भवितव्य बनता है।

ऐसे आयोजन से जीवों के कष्ट दूर हुए

श्रद्धा और विश्वास के साथ की गयी धर्म भावना से सातिशय पुण्य की प्राप्ति होती है और जो परंपरा से मुक्ति का कारण आगम में बताया है। प्रतिवर्ष अष्टान्हिका में सिद्ध परमेष्ठी के जो अष्ट कर्म बंधन की श्रंखला से मुक्त होकर सिद्ध शिला में विराजमान हैं। उनके गुणों का स्मरण और भक्ति भाव से विधान कर स्वयं का और विश्व कल्याण की भावना को भाते हैं। इतिहास में अनेको ऐसे उदाहरण हैं, जिसमें ऐसे आयोजन से जीवों के कष्ट दूर हुए।

हमें अधिक से अधिक पुण्य का लाभ मिले

सबसे प्रसिद्ध मैनासुंदरी के पाठ का वर्णन आता है और तभी से जैन धर्म के हरेक मंदिरजी आदि में ये पाठ विधान बहुत भावों के साथ किया जाता है। ‘मैना सुंदरी किया पाठ यह पर्व अठाइनि में पति युक्त सात शतक कोढ़ीन का, गया कुष्ठ छिन’ में संतुलित और संयमित और परमोत्कृष्ट भावना से किया गया विधान महान कल्याणकारी और फलदायी होता है। अतः हम सभी को अपने आहार-विचार और चर्या को शुद्ध रखते हुए आने वाले दिनों के लिए तैयार करना है और सभी कार्य पूर्ण शुद्धता को लिए हुए अंजाम देना है। जिससे हमें अधिक से अधिक पुण्य का लाभ मिले।

इस मौके संयोजक अशोक कुमार जैन, अध्यक्ष राजेश बैनाड़ा, मंत्री विजय जैन निमोरब, कोषाध्यक्ष मगन कुमार, अरुण जैन, महेशचंद जैन, अतुल जैन, रामप्रकाश जैन, सचिन जैन, गिरीशचंद जैन, अंकित जैन, मुकेश जैन, प्रवीण जैन, मीडिया प्रभारी राहुल जैन और सकल जैन समाज मौजूद था।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page