पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्मसागर जी का 58वां आचार्य पद प्रतिष्ठापना महोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। गुरु गुणानुवाद और महामंडल विधान विशेष आकर्षण रहा। पदमपुरा से राजेश पंचोलिया की विशेष रिपोर्ट
पदमपुरा (जयपुर) । अतिशय क्षेत्र पदमपुरा राजस्थान में तृतीय पट्टाधीश का 58वां आचार्य पद प्रतिष्ठापना महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया गया। विशाल पंडाल में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

पंचम पट्टाधीश का सानिध्य
प्रथमाचार्य की परंपरा के पंचम पट्टाधीश इन दिनों पदमपुरा में 33 पीछी विराजित हैं। आचार्य संघ, गणिनी आर्यिका श्री सरस्वतीमति माताजी, गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी के सानिध्य में यह महोत्सव सम्पन्न हुआ।
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना में 58 अंक का आध्यात्मिक महत्व समझाते हुए कहा कि 5 और 8 का योग 13 होता है। आगम अनुसार दिगंबर मुनियों के 13 प्रकार के चारित्र बताए गए हैं, जो मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ने का आधार हैं।
गुरु गुणानुवाद – शिष्य का धर्म
राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने कहा कि गुरु का गुणानुवाद करना शिष्य का परम कर्तव्य है। हम जो भी हैं, वह गुरु की शिक्षा, ज्ञान और स्नेह का परिणाम है।
आचार्य श्री शांतिसागर जी ने श्रावक समाज और मुनियों को आदर्श मार्ग दिखाया और स्वयं उस पर चलकर धर्म की प्रभावना की। 36 दिन की कुंथलगिरि में संलेखना लेकर उन्होंने जीवन को साधना का संदेश दिया।

परंपरा का गौरवपूर्ण क्रम
समाधि के पश्चात प्रथम पट्टाचार्य श्री वीर सागर जी तथा उनके बाद श्री शिव सागर जी द्वितीय पट्टाचार्य बने। धर्म प्रभावना हेतु आचार्य श्री धर्मसागर जी ने पृथक विहार किया और अनेक भव्य जीवों को दीक्षा-शिक्षा दी। समाज ने कई बार उन्हें आचार्य पद स्वीकार करने का आग्रह किया, किंतु उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार किया।
1969 का ऐतिहासिक प्रसंग
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि ब्रह्मचारी अवस्था में वे सहित 11 भव्य जीवों ने दीक्षा हेतु श्रीफल चढ़ाया था। उसी समय द्वितीय पट्टाचार्य अस्वस्थ हो गए। उन्होंने कहा कि यदि वे दीक्षा न दे सके तो वरिष्ठ मुनि धर्मसागर जी दीक्षा देंगे। गुरु के इन वचनों ने मानो भावी आचार्य को मनोनीत कर दिया। उनकी समाधि के पश्चात तृतीय पट्टाधीश के रूप में आचार्य श्री धर्मसागर जी की प्रतिष्ठा हुई। यह मूल बाल ब्रह्मचारी परंपरा की निरंतरता रही।

गुणों की जीवंत मिसाल
आचार्य श्री धर्मसागर जी के वितराग, सरल, परोपकारी और निस्पृह व्यक्तित्व के अनेक संस्मरण सुनाए गए। सन 1974 में देहली में आयोजित श्री महावीर स्वामी निर्वाण महोत्सव में उन्होंने दिगंबर समाज की मर्यादाओं की रक्षा की।
महामंडल विधान का भव्य दृश्य
पंडित धर्मचंद शास्त्री के निर्देशन में महामंडल विधान सम्पन्न हुआ। सौधर्म इंद्र श्री दीपक, श्रीमती पूनम पाटनी (कोलकाता), कुबेर इंद्र, महायज्ञ नायक डॉ. जगमोहन-श्रीमती वर्षा हुमड (कनाडा), यज्ञ नायक श्री आशीष-श्रीमती मनीषा धार सहित सैकड़ों इंद्र परिवारों ने पूजन में भाग लिया।
महामंडल की रचना विभिन्न धान-अनाज से की गई। 58 जल कलश, 58 चंदन कलश, 58 अक्षत थाल, 58 प्रकार के देश-विदेश के पुष्प, 58 नैवेद्य, 58 दीपक, 58 धूप, 58 फल एवं 58 अर्घ्य अर्पित किए गए। मंत्रोच्चार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, आर्यिका श्री महायश मति एवं अन्य साधु-साध्वियों द्वारा हुआ।
विनयांजलि और वर्षायोग के निवेदन
विनयांजलि सभा में भरत जैन इंदौर ने वर्ष 2027 के वर्षायोग हेतु निवेदन किया। वर्ष 2026 के लिए किशनगढ़, सीकर, जयपुर (बड़के बालाजी), निवाई सहित विभिन्न स्थानों से सैकड़ों भक्तों ने आग्रह रखा। भींडर जैन समाज ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हेतु निवेदन प्रस्तुत किया।
श्रवण बेलगोला जैन मठ के भट्टारक एवं अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर जी द्वारा प्रेषित विनयांजलि का वाचन मुनि श्री हितेंद्रसागर जी एवं मुनि श्री प्रभवसागर जी ने किया।
सम्मान और विमोचन
आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन में श्री राजेंद्र कटारिया, राजेश शाह (अहमदाबाद), विवेक काला, सुनील अग्रवाल, सुरेश सबलावत (जयपुर), गजराज गंगवाल (देहली), विमल पाटनी, संजय पापड़ीवाल (किशनगढ़), कमलेश मालवीय (सलूंबर), भरत जैन (इंदौर) सहित अनेक श्रद्धालु सहभागी बने।
कार्यक्रम का संचालन प्रतिष्ठाचार्य श्री धर्मचंद शास्त्री एवं वसंत वेद (किशनगढ़) ने किया। प्रतिष्ठाचार्य श्री धर्मचंद शास्त्री का सम्मान हुआ तथा आचार्य श्री धर्मसागर अभिवंदन ग्रंथ का विमोचन किया गया।
राजस्थान, मध्यप्रदेश, देहली, कलकत्ता, अहमदाबाद, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक सहित अनेक राज्यों से हजारों भक्त इस ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित रहे।













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