जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा कुंभ और माता प्रभावती के पुत्र थे। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान मल्लिनाथ ने संसार की नश्वरता को जानकर दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने कठोर तपस्या और आत्म-चिंतन के माध्यम से पहले केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखर जी पर एक माह का योग निरोध (उपवास) कर निर्वाण पद प्राप्त किया। श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ जी के स्वरूप को लेकर भिन्नता है। श्वेतांबर परंपरा उन्हें स्त्री तीर्थंकर के रूप में मानती है जबकि, दिगंबर परंपरा के अनुसार वे पुरुष तीर्थंकर थे। हालांकि, उनके द्वारा दी गई अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षाएं दोनों ही परंपराओं में समान रूप से पूजनीय हैं।
भगवान के जीवन के रोचक प्रसंग
भगवान मल्लिनाथ जी का जीवन चरित्र जैन पुराणों में अत्यंत प्रेरक और रोचक है। उनके जीवन की सबसे खास बात उनके पूर्व जन्म के मित्र और उनके द्वारा किया गया मायाचार (छल) है। जिसके कारण उन्हें तीर्थंकर प्रकृति के साथ ’स्त्री’ (श्वेतांबर मान्यता अनुसार) या विशिष्ट शारीरिक संरचना प्राप्त हुई। भगवान मल्लिनाथ अपने पूर्व जन्म में महाबल नाम के राजा थे। उनके छह बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे। उन सातों मित्रों ने एक साथ वैराग्य धारण किया और कठिन तपस्या करने का संकल्प लिया। सातों मित्रों ने तय किया कि वे जो भी तप या उपवास करेंगे, बिल्कुल एक समान करेंगे ताकि सबको समान फल मिले। महाबल (मल्लिनाथ का जीव) अन्य मित्रों से अधिक आत्मिक शक्ति चाहते थे। उन्होंने अपने मित्रों को बताए बिना, बीमारी या अन्य बहानों से अपने उपवास की अवधि बढ़ा दी।
इस छल (मायाचार) के कारण उन्होंने ‘स्त्री वेद’ का बंध किया, लेकिन अपनी कठिन तपस्या के कारण ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का भी अर्जन कर लिया। राजा महाबल का जीव स्वर्ग से च्युत होकर मिथिला नगरी के राजा कुंभ और माता प्रभावती के यहाँ अवतरित हुआ। उनके जन्म के समय माता को ‘मल्ल’ (फूलों की माला) धारण करने का स्वप्न आया और वे बचपन से ही अत्यंत सुंदर थे, इसलिए उनका नाम मल्लिनाथ रखा गया।
वैराग्य की अनूठी घटना
मल्लिनाथ जी की सुंदरता की चर्चा चारों ओर थी। उनके पूर्व जन्म के वही छह मित्र (जो अब अलग-अलग राज्यों के राजा थे) उनसे विवाह करना चाहते थे या उन्हें पाना चाहते थे। इस स्थिति को देखकर मल्लिनाथ जी ने उन्हें सत्य समझाने के लिए एक युक्ति अपनाई। उन्होंने अपनी एक हूबहू दिखने वाली स्वर्ण प्रतिमा बनवाई, जो अंदर से खोखली थी। वे रोज अपने भोजन का एक ग्रास उस प्रतिमा के अंदर डाल देते और उसे ढंक देते। कुछ समय बाद जब उन छह राजाओं को बुलाया गया और उस प्रतिमा का ढक्कन खोला गया तो उसमें से भयंकर दुर्गंध आई। मल्लिनाथ जी ने समझाया कि ‘जब इस सुंदर दिखने वाली प्रतिमा की यह स्थिति है तो हाड़-मांस के इस शरीर पर कैसा मोह? यह शरीर भीतर से अशुद्धियों से भरा है। यह देख उन छह राजाओं को जाति स्मरण (पिछले जन्म का ज्ञान) हो गया और मल्लिनाथ जी ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने सहेतुक वन में जाकर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेने के मात्र 2 दिन बाद ही उन्हें केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त हो गया। यह किसी भी तीर्थंकर के लिए सबसे कम समय की साधना मानी जाती है। उन्होंने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया और अंत में सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया। भगवान मल्लिनाथ का जीवन सिखाता है कि धर्म में भी दिखावा या छल (मायाचार) करना कर्मों के बंधन का कारण बनता है। जहां सरलता होती है, वहीं परमात्मा का वास होता है।











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