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आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी के वैराग्यपथ पर संयम के 73 वर्ष : कठोर साधना से जैन समाज को अमूल्य सृजन किया प्रदान


आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी के वैराग्य पथ पर संयम धारण करने के 73 साल पूरे हो गए हैं। आर्यिका श्री ने अपने ज्ञान प्रकाश से जैन समाज को अद्भुत प्रभावना से अलंकृत किया है। आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज और आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षित आर्यिका इन दिनों अयोध्या में विराजित हैं। अयोध्या से अभिषेक पाटील की यह विशेष प्रस्तुति पढ़िए…


अयोध्या(उप्र)। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या (उप्र) में विराजमान हैं। सन् 1934 की शरद पूर्णिमा के शुभ दिन जब चंद्रमा की शुभ्र छटा संपूर्ण धरा को अपने आवेश में समेटे थे। तब उप्र के बाराबंकी जनपद के टिकेत नगर में बाबू छोटेलाल जैन के घर एक कन्या का जन्म हुआ। कौन जानता था कि मां मोहिनी की यह कन्या एक दिन जगत माता बनकर अपने ज्ञान के प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करेगी। पद्मनंदि पंच विंशतिका के स्वाध्याय के कारण बचपन से ही विकसित वैराग्य के बीज 1952 में शरद पूर्णिमा के दिन ही प्रस्फुटित हुए, जब बाराबंकी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से सप्तम प्रतिमा (ब्रह्मचर्य) के व्रत अंगीकार किए। 1953 में चैत्र कृष्णा एकम् को श्री महावीर जी में आचार्य श्री देशभूषण जी से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर ‘वीरमति’ नाम प्राप्त किया।

व्रत एवं नियमों का कठोरता से पालन करते हुए आप अपनी संज्ञा ‘वीरमति’ को तो सार्थक कर ही रही थीं, किन्तु आपको मात्र क्षुल्लिका के व्रतों से संतोष कहां। 19 वर्ष की यौवनावस्था में क्षुल्लिका के व्रतों का कठोरता से पालन करने के साथ ही आप निरंतर वैराग्य के भावों को विकसित करती रहीं एवं आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञा से उनके ही शिष्य आचार्यश्री वीरसागर जी से वैशाख कृष्ण द्वितीया को 1956 में माधोराजपुरा में आर्यिका के व्रतों को अंगीकार कर ‘ज्ञानमति’ की सार्थक संज्ञा प्राप्त की। धन्य हैं वे आचार्य श्री वीरसागर जी, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से इनकी प्रतिभा का आंकलन कर इन्हें ‘ज्ञानमति’ नाम दिया।

आचार्य श्री के तीन बार दर्शन करने वाली आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी 

आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी दैदीप्यमान सूर्य की भांति अपने प्रकाश-रश्मियों से जैन समाज को आलोकित कर रहीं हैं। श्री ज्ञानमति माताजी, जिन्होंने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के तीन बार दर्शन किए। नीरा (महाराष्ट्र) में सन् 1954 में, बारामती (महा.) में सन् 1955 में तथा कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र (महा.) में सन् 1955 में सल्लेखना के समय। सन् 1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी ने कुंथलगिरि में देशभूषण-कुलभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की सल्लेखना ली थी। ज्ञानमति माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमति माताजी थीं। कुंथलगिरि में एक माह आचार्यश्री के श्रीचरणों में रहीं। क्षुल्लिकावस्था में आचार्य श्री की प्रत्यक्ष सल्लेखना तो देखी ही। साथ ही उनके श्रीमुख से अनेक अनुभव वाक्य भी प्राप्त किए।

विराट साहित्य की श्रृंखला का किया सृजन 

ज्ञानमति माताजी (क्षुल्लिका वीरमति) ने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी से आर्यिका दीक्षा की याचना की थी लेकिन, आचार्य श्री ने कहा था कि मैंने सल्लेखना ले ली है और अब दीक्षा देने का त्याग कर दिया है। तुम मेरे शिष्य वीरसागर से आर्यिका दीक्षा लेना। अतः आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के आदेशानुसार उन्होंने 1956 की वैशाख कृष्ण दूज को माधोराजपुरा (जयपुर-राजस्थान) में आचार्य श्री शांतिसागर जी के शिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा (महिलाओं के लिए दीक्षा की सर्वाेच्च अवस्था) ली और आर्यिका ज्ञानमति बन गईं। नाम के अनुसार सारे विश्व में एक विराट साहित्य की श्रृंखला का सृजन किया।

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