सनावद में युगल मुनिराज के सानिध्य में पर्युषण पर्व का शुभारंभ उत्तम छमा धर्म के साथ हुआ। सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा, गुरु भक्ति और प्रवचनों से पूरा नगर धर्ममय वातावरण में डूबा रहा। पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट…
सनावद। नगर में चातुर्मासरत मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि सहनशीलता क्रोध को उत्पन्न न होने देने का नाम है। यदि क्रोध हो भी जाए तो विवेक और नम्रता से उसे समाप्त करना ही उत्तम क्षमा है। क्षमा से आत्मा शुद्ध होती है और शांति की प्राप्ति होती है। प्रवक्ता सन्मति जैन काका ने बताया कि पर्वाधिराज पर्युषण के प्रथम दिन युगल मुनिराज द्वारा आचार्य वंदना व ध्यान के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके बाद श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर व संत निलय में पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा और सामूहिक पूजन संपन्न हुआ। अभिषेक का सौभाग्य संयम सुदेश कुमार श्रीकांत जटाले परिवार को तथा शांतिधारा का सौभाग्य अभिजीत अक्षय कुमार सराफ को प्राप्त हुआ।
जैन धर्म के दस प्रमुख लक्षणों की आराधना
मुनि श्री विश्व सूर्य सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि दस लक्षण धर्म जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो आत्मशुद्धि और आचार-संयम का मार्ग प्रशस्त करता है। यह पर्व पर्युषण के बाद दस दिनों तक चलता है और जैन धर्म के दस प्रमुख लक्षणों की आराधना की जाती है। दोपहर में मुनि श्री द्वारा तत्त्वार्थ सूत्र पूजन और उसका वाचन कर समाजजनों को गहन ज्ञान प्रदान किया गया। शाम को गुरु भक्ति, सामायिक और प्रश्न मंच का आयोजन हुआ। दिन का समापन सभी समाजजनों द्वारा भक्ति भाव से जिनेंद्र देव की आरती करने के साथ हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और पूरे नगर में धार्मिक उत्साह का वातावरण बना रहा।













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