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स्थापना दिवस के साथ योगी परिवार का वात्सल्य मिलन: जल एवं पंचामृत से अभिषेक कर शांतिधारा की 


रतलाम शहर से 13 किमी दूर स्थित श्री दिगम्बर जैन धर्मस्थल शीतल तीर्थ। आचार्य श्री योगीन्द्र सागर जी की पावन प्रेरणा से निर्मित एवं पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी एवं आचार्य श्री सुंदरसागर जी के पावन सानिध्य में प्रतिष्ठित 72 जिनमंदिरों से सुशोभित कैलाश पर्वत की कृत्रिम रचना, जो अपने निर्माण के प्रारंभ से ही अतिशय भूमि के रूप में जानी जाती है। इस वर्ष भी 14 जून को इस क्षेत्र का स्थापना दिवस भव्यता के साथ मनाया गया। रतलाम से पढ़िए, राकेश जैन चपलमन की यह खबर…


रतलाम। जहां श्रद्धा और विश्वास की दृढ़ता हो वहां अतिशय स्वयं प्रकट हो जाते है और ऐसी ही अतिशय भूमि है मप्र के रतलाम शहर से 13 किमी दूर स्थित श्री दिगम्बर जैन धर्मस्थल शीतल तीर्थ। आचार्य श्री योगीन्द्र सागर जी की पावन प्रेरणा से निर्मित एवं पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी एवं आचार्य श्री सुंदरसागर जी के पावन सानिध्य में प्रतिष्ठित 72 जिनमंदिरों से सुशोभित कैलाश पर्वत की कृत्रिम रचना, जो अपने निर्माण के प्रारंभ से ही अतिशय भूमि के रूप में जानी जाती है। इस वर्ष भी 14 जून को इस क्षेत्र का स्थापना दिवस भव्यता के साथ मनाया गया। मुनि श्री सद्भाव सागर जी (ससंघ), आर्यिका 105 श्री विविक्तश्री माताजी (ससंघ), आर्यिका श्री विशाखाश्री माताजी (ससंघ) के पावन सानिध्य में तीर्थ स्थापना दिवस के साथ ही योगी परिवार का वात्सल्य मिलन भी आयोजित किया गया। क्षेत्र अधिष्ठात्री डॉ. सविता दीदी ने बताया कि प्रतिवर्ष 14 जून को क्षेत्र का स्थापना दिवस एवं 17 फरवरी को आचार्य श्री योगीन्द्र सागर जी महामुनिराज का जन्मावतरण दिवस भव्यता से मनाया जाता है। जिसमें सैकड़ों श्रावक श्राविकाओं सहित कई गुरुभक्त अपनी सहभागिता देते हैं। इस स्थापना दिवस क्रम में प्रातः काल प्रथम बार अतिशयकारी मूलनायक श्री आदिनाथ भगवान चांदखेड़ी वाले बाबा को कृत्रिम कैलाश पर्वत पर पधराकर जल एवं पंचामृत से अभिषेक किया गया। इसके बाद शांतिधारा की गई।

सूर्य के ताप मो निश्तेज होते देखा 

11 फीट उतुंग पद्मासन श्री आदिनाथ भगवान पर जब जल एवं दूध की धारा की गई तो चारों ओर से भगवान के जयकारों से क्षेत्र गुंजायमान हो गया। इस समय साक्षात अतिशय प्रकट हुआ कि वर्तमान में गर्मी का प्रचंड ताप है और प्रातः काल से ही सूर्य में तेजी देखने को मिलती है किंतु इस अभिषेक क्रिया को प्रारंभ करने से लेकर शांतिधारा तक सूर्य ने विनम्रता दिखाई और ठंडी हवाओं के बीच सबने इस भक्ति आनंद में गोते लगाए। जैसे ही अभिषेक क्रिया पूर्ण हुई सूर्य में तेजी आ गई। यह वह अतिशय है जो क्षेत्र पर उपस्थित सभी श्रावकों ने देखा और दिन भर इसी विषय की चर्चा भी रही।

सभा में इनकी रही उपस्थिति

प्रातः 9 बजे गुरु मंदिर में श्री ऋषि विधान का आयोजन हुआ एवं दोपहर में गुरु गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ। इसमें आमंत्रित विद्वानों में डॉ. अनुपम जैन, इंदौर एवं मुख्य अतिथि के रूप में नगरपालिका निगम बड़नगर चेयरमेन अभय टोंग्या, अशोक गोधा, पुखराज सेठी, डॉ. नेमीचंद जैन, महेंद्र गुड़वाला, संजय बिलाला की उपस्थिति रही।

गुरु मुख से तपस्या और साधना की प्रभावना को जरूर सुना

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में आर्यिका विशाखा श्री माताजी ने कहा कि पूज्य गुरुदेव अपनी साधना स्व हित के लिए करते थे किंतु उसी साधना के प्रताप से आने वाले श्रावको के दुखो को भी दूर करते थे। इसकी मैं स्वयं प्रत्यक्ष प्रमाण हूं क्योंकि, मुझे गुरुदेव के उन्हीं चमत्कारो को देखने का सौभाग्य मिला। आर्यिका विविक्तश्री माताजी ने कहा कि हमने आचार्य योगीन्द्र सागर जी के कभी दर्शन नहीं किए किंतु गुरु मुख से इनकी तपस्या और साधना की प्रभावना को जरूर सुना है। जब उस वर्णन को सुनना ही मन को आनंद से भर देता है तो ऐसे गुरुओं के प्रत्यक्ष दर्शन किसी तीर्थ दर्शन से कम नहीं होंगे।

शीतल तीर्थ की भूमि उर्जा और अतिशय से भरपूर

मुनि श्री सद्भाव सागर जी ने कहा कि अब तक मैंने इस क्षेत्र के अतिशय के बारे में सुना था किंतु अब उस अतिशय को महसूस भी कर लिया है क्योंकि, जब मैं यहां आया तो रुग्णावस्था में था और जैसे ही इस भूमि के संपर्क में आया स्वयं को स्वस्थ एवं आनंदित महसूस कर रहा हूं। यह शीतल तीर्थ की भूमि उर्जा और अतिशय से भरपूर है। इसी अवसर पर डॉ. सविता दीदी ने क्षेत्र की भावी योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए उपस्थिति श्रमण संघ को क्षेत्र पर ही प्रवास का निवेदन किया एवं आगंतुक सभी गुरुभक्तों का आभार प्रकट किया।

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