भारतीय संस्कृति को विश्व की सबसे प्राचीन और अनादि परंपरा के रूप में स्थापित करना है तो हमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के युग तक जाना होगा। इसी विचार को सुदृढ़ करने के लिए आदिनाथ जन्म कल्याणक, महावीर जन्म कल्याणक और भरत चक्रवर्ती जन्मोत्सव को एक समन्वित सांस्कृतिक दृष्टि से मनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। पढ़िए ओम पाटोदी की विशेष रिपोर्ट…
इंदौर (ओम पाटोदी)। भारतीय संस्कृति को विश्व की सबसे प्राचीन और अनादि परंपरा के रूप में स्थापित करना है तो हमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के युग तक जाना होगा। इसी विचार को सुदृढ़ करने के लिए आदिनाथ जन्म कल्याणक, महावीर जन्म कल्याणक और भरत चक्रवर्ती जन्मोत्सव को एक समन्वित सांस्कृतिक दृष्टि से मनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
वर्तमान समय में भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक पूरे देश में बड़े उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जाता है। इसके कारण कई लोगों में यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि जैन धर्म की शुरुआत महावीर स्वामी से ही हुई है और उन्हें ही जैन धर्म का प्रवर्तक मान लिया जाता है। जबकि वास्तव में जैन परंपरा में भगवान महावीर 24वें तीर्थंकर हैं और जैन धर्म की परंपरा उनसे बहुत पहले से चली आ रही है। इसी भ्रम को दूर करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से जैन समाज के प्रबुद्धजनों और संत-महात्माओं के प्रयासों से भगवान आदिनाथ के जन्म कल्याणक महोत्सव को भी व्यापक रूप से मनाने की परंपरा पुनः प्रारंभ हुई है।
इस वर्ष भगवान आदिनाथ का जन्म कल्याणक 12 मार्च, गुरुवार (चैत्र कृष्ण नवमी) को मनाया जा रहा है। कई स्थानों पर भगवान आदिनाथ के जन्म दिवस से लेकर भगवान महावीर के जन्म कल्याणक चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (इस वर्ष 30 मार्च) तक लगभग 20–21 दिनों तक लगातार धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस अवधि में समाजजनों के घर-घर भक्तामर पाठ, प्रभातफेरी, धार्मिक प्रवचन और अन्य आध्यात्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से उत्सव का वातावरण बनाए रखने की परंपरा भी विकसित हो रही है।
हालांकि यह आयोजन अभी मुख्यतः जैन समाज तक ही सीमित है। इस संदर्भ में यह भी विचार किया जा रहा है कि भगवान आदिनाथ स्वामी के जन्म कल्याणक को सरकारी स्तर पर भी मान्यता दिलाने के प्रयास किए जाएं। यदि ऐसा होता है तो इससे न केवल जैन श्रमण संस्कृति बल्कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति की प्राचीनता को भी विश्व स्तर पर स्थापित करने में सहायता मिलेगी।
‘भारत’ नाम और भरत चक्रवर्ती का ऐतिहासिक महत्व
पिछले कुछ समय से यह चर्चा भी प्रचलित हुई है कि देश का नाम “भारत” किस भरत के नाम पर पड़ा। इतिहास में तीन प्रमुख व्यक्तियों का उल्लेख मिलता है— भरत चक्रवर्ती (भगवान ऋषभदेव के पुत्र), भरत (भगवान राम के भाई) और भरत। यदि बाद के दो भरतों से देश का नाम जोड़ा जाता है तो भारतीय संस्कृति का कालखंड अपेक्षाकृत सीमित हो जाता है, जबकि ऋषभदेव पुत्र भरत के नाम से “भारतवर्ष” नाम पड़ने के पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाण अधिक प्राचीन और व्यापक माने जाते हैं।
इन प्रमाणों का उल्लेख केवल जैन श्रमण परंपरा में ही नहीं, बल्कि वैदिक साहित्य में भी मिलता है। शिवपुराण, स्कंदपुराण, अग्निपुराण तथा श्रीमद्भागवत जैसे ग्रंथों में यह वर्णन मिलता है कि राजा नाभि के पुत्र ऋषभदेव और उनके पुत्र भरत हुए, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। वायु पुराण में भी हिमालय के दक्षिण स्थित इस प्रदेश को भरत को समर्पित किए जाने और उसी कारण “भारतवर्ष” नाम पड़ने का उल्लेख मिलता है।
भरतोत्सव की परिकल्पना
इन्हीं ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों के आधार पर पिछले कुछ समय से भरत चक्रवर्ती के जन्मोत्सव को “भरतोत्सव” के रूप में मनाने की चर्चा प्रारंभ हुई है। विशेष बात यह है कि भरत चक्रवर्ती और भगवान आदिनाथ का जन्म एक ही तिथि चैत्र कृष्ण नवमी को माना जाता है। यदि इस दिन भरत चक्रवर्ती के जन्मोत्सव को भरतोत्सव के रूप में मनाया जाए तो यह भारतीय संस्कृति की प्राचीनता को विश्व स्तर पर प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है।
भरतोत्सव: भारत की सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करने का महापर्व
विश्व में अनेक देश हैं और प्रत्येक देश की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान होती है। उनके अपने त्योहार, परंपराएं, वेशभूषा और जीवन-दर्शन होते हैं। यदि दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा विश्व में अद्वितीय रही है। इस भूमि के चिंतन ने न केवल भारतीय समाज को दिशा दी, बल्कि विश्व के अनेक संतों, दार्शनिकों और विचारकों को भी प्रभावित किया है।
भारत की विशिष्टता केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों के इतिहास, आध्यात्मिक परंपराओं और जीवन मूल्यों में निहित है। विश्व के अधिकांश देशों के पास इतनी प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत नहीं है जिस पर वे हजारों वर्षों का गौरव कर सकें। इसके विपरीत भारत एक ऐसा देश है जिसके पास स्वतंत्र दर्शन, समृद्ध संस्कृति, अत्यंत प्राचीन इतिहास और संतुलित जीवनशैली की परंपरा है।
इतिहास पर आक्रमण, परंतु संस्कृति अडिग
इतिहास के विभिन्न कालखंडों में भारत ने अनेक आक्रमणों और चुनौतियों का सामना किया। विदेशी आक्रांताओं ने मंदिरों को नष्ट किया, ग्रंथालयों को जलाया और सांस्कृतिक विरासत को मिटाने का प्रयास किया। नालंदा जैसे महान विश्वविद्यालयों के विशाल ग्रंथालयों को जलाकर हजारों-लाखों अमूल्य ग्रंथ नष्ट कर दिए गए। अनेक जैन और हिंदू मंदिरों को भी क्षति पहुंचाई गई तथा बलपूर्वक धर्म परिवर्तन के प्रयास हुए।
फिर भी इन सभी परिस्थितियों के बावजूद भारत की आध्यात्मिक चेतना समाप्त नहीं हुई। इसका कारण यह था कि भारतीय संस्कृति केवल मंदिरों और भवनों तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज के जीवन और जनमानस में गहराई से समाई हुई थी। घर-घर में धर्मग्रंथों का अध्ययन होता था और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता था। मंदिरों की मूर्तियां भले ही खंडित कर दी गई हों, लेकिन भारत की आध्यात्मिक चेतना को खंडित नहीं किया जा सका। आज भी देश के विभिन्न भागों में भूगर्भ से प्राप्त हो रही प्राचीन प्रतिमाएं इस सत्य का प्रमाण हैं कि इतिहास को दबाया जा सकता है, परंतु मिटाया नहीं जा सकता।
भारत में भरत का मूर्तिशिल्प
भारत के अनेक मंदिरों और तीर्थस्थलों पर ऋषभदेव पुत्र भरत के मूर्तिशिल्प भी देखने को मिलते हैं। अधिकांश स्थानों पर भगवान आदिनाथ के साथ उनके दोनों यशस्वी पुत्र भरत और बाहुबली की प्रतिमाएं स्थापित हैं। कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की विश्व प्रसिद्ध प्रतिमा के समीप भगवान भरत की एक प्राचीन प्रतिमा भी दर्शनीय है।
इन प्रतिमाओं में भरत का चित्रण प्रायः गृहस्थ या राजसी अवस्था में नहीं, बल्कि मुनि दीक्षा ग्रहण करने के बाद की ध्यानमग्न अवस्था में किया गया है। इसका कारण यह है कि जैन परंपरा में वैराग्य और संयमित जीवन को अत्यधिक महत्व दिया गया है।
सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का अवसर
भारत की मूल संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए “भरतोत्सव” का आयोजन एक सार्थक पहल हो सकती है। यदि यह उत्सव चक्रवर्ती भरत के जन्मदिवस चैत्र कृष्ण नवमी को मनाया जाए तो यह भारत की सांस्कृतिक स्मृति को पुनः जागृत करने का ऐतिहासिक अवसर बनेगा।
वर्ष 2026 में यह तिथि 12 मार्च, गुरुवार को पड़ रही है। आवश्यकता है कि भविष्य में इस पर्व को व्यापक जनभागीदारी के साथ मनाया जाए और भारत सरकार भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने पर विचार करे।
“भरतोत्सव” केवल एक पर्व नहीं होगा, बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का उत्सव होगा जिसने हजारों वर्षों से इस राष्ट्र को जीवंत बनाए रखा है।













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