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जहां मान है, वहां द्वंद्व है, जहां मार्दव है वहां शांति है: मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी ने मार्दव धर्म को आत्मसात करने की दी प्रेरणा 


नगर में चल रहे चातुर्मास के दौरान मुनिराजों के प्रवचन से यहां की जनता अपार धर्म प्रभावना का लाभ अर्जित कर रही है। मुनिराज श्री सर्वार्थसागर जी महाराज के प्रवचन में गुरुवार को दस धर्मों पर चर्चा करते हुए अपनी देशना दी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। पथरिया से पढ़िए, यह खबर…


पथरिया। नगर में चल रहे चातुर्मास के दौरान मुनिराजों के प्रवचन से यहां की जनता अपार धर्म प्रभावना का लाभ अर्जित कर रही है। मुनिराज श्री सर्वार्थसागर जी महाराज के प्रवचन में गुरुवार को दस धर्मों पर चर्चा करते हुए अपनी देशना दी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। आचार्यश्री और मुनिराजों के सानिध्य में नित अभिषेक, शांतिधारा और पूजन आदि किए जा रहे हैं। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने कहा कि आचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ के चातुर्मास के दौरान उनके शिष्य विचित्र बाते प्रणेता मुनिश्री सर्वार्थ सागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि धर्म का आरंभ जहां होता है,वह स्थान है विनय और धर्म की पूर्णता जहां होती है वह स्थिति है मार्दव। जब तक मन में अहंकार है तब तक ज्ञान भी बंधन बन जाता है। श्रुत, तप, शील ये सब तभी सार्थक हैं, जब उनमें नम्रता समाहित हो क्योंकि, अहंकार धर्म की जड़ में दीमक की तरह होता है।

ऊपर से वृक्ष हरा भरा दिखे, पर भीतर से खोखला हो जाता है। मार्दव धर्म आत्मा को झुकाता नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर छिपी दिव्यता को प्रकट करता है। जहां मान है, वहां द्वंद्व है और जहाँ मार्दव है, वहा शांति है, समता है, साधना है। मन, वचन और काया की कठोरता, ये तीनों मोक्षमार्ग के विरोधी हैं। उन्होंने कहा कि जो नम्र है, वही सीखता है। जो सीखता है, वही बदलता है और जो बदलता है वही मुक्त होता है। अतः, मुमुक्षु को चाहिए कि वह दिन-रात आत्मा में मार्दव का संकल्प करे। अपने भीतर से ‘मैं श्रेष्ठ हूं’ की गांठ को पूरी तरह खोल दे।

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