निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों धर्मसभा में अपने प्रवचनों के माध्यम से जो उपदेश प्रदान कर रहे हैं। उनका समाजजनों पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। उनकी वाणी से धर्म प्रभावना बढ़ रही है। उनके प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित हो रहे हैं। शनिवार को दिए प्रवचन की पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक गुण का, प्रत्येक पर्याय का स्वतंत्र अपना अपना अधिकार होता है। सभी क्षेत्र एक समान नहीं होते, कोई द्रव्य एक समान नहीं होता, कितने द्रव्य हैं वे सभी अपनी स्वतंत्र सत्ता रखते हैं, किंचित मात्र से उनकी सत्ता पराधीन नहीं है, स्वचतुष्टय स्वतंत्र होता है। जितने क्षेत्र है हर क्षेत्र भिन्न भिन्न है, सभी क्षेत्रों का एक समान नेचर नहीं है। हर कदम की एनर्जी अलग अलग है, पूरा क्षेत्र एक समान नहीं हो सकता, बहुत ताकतवान एनर्जी भी किसी स्थान पर मिलती है। एक एक पत्थर का नेचर अलग अलग है। पत्थर सेंड स्टोन भी है और मार्बल भी। मार्बल के पत्थर से दही जम जाए और सेंड स्टोन के पत्थर से दही फट जाए। वही पृथ्वीकाय है जिसका सेंडस्टोन बन रहा है, वही थोड़ा अच्छा बन जाये तो डायमंड बन जाये। एक रेत के कारण की एनर्जी स्वतंत्र होती है। एक कौवा पूर्व की दिशा की ओर सुबह-सुबह बोल जाए तो समझ लेना शुभ समाचार आ रहा है और वह कौवा थोड़ा सा उत्तर की तरफ बोल जाए, समझ लेना बुरा समाचार आ रहा है, अब समझिए दिशा का महत्व कितना है।
भव की भी भिन्न भिन्न एनर्जी है
यह मत समझना कि आज का दिन बुरा है तो कल का दिन भी बुरा होगा, नहीं कल का दिन बहुत अच्छा हो सकता है। काल स्वतंत्र है। भव की भी भिन्न भिन्न एनर्जी है। जीव एक ही है, देव भव अलग है, मनुष्य, तिर्यंच भव अलग है, इसमे भी भेद करो, आर्यखण्ड का भव अलग है, म्लेच्छ खण्ड का भव अलग है। इसमे भी भारत व विदेश का भेद करो। इसमे प्रान्त, नगर, मुहल्ले के भेद करो। इसी तरह शरीर के प्रत्येक अंग में अलग-अलग एनर्जी है, आत्मा एक ही है, शरीर एक ही व्यक्ति का है लेकिन नाखुन से लेकर सिर तक एक एक इंच की एनर्जी अलग अलग है। सिर या हाथों का गंधोदक नहीं, पैरो का ही बनता है। आशीर्वाद पैरों से हाथों से बनता है। गंधोदक की ताकत पैरों में है लेकिन आशीर्वाद की ताकत हाथों में है।
विपरीतता बने तो थोड़ा क्षेत्र टाल दो
तिल, भौरी और मसा बसे दाहिने अंग, चाह फिरे वनखंड में, तहां न छोड़े लक्ष्मी संग। ज्योतिष शास्त्र में शरीर के अंग में फड़कन हो तो बहुत बड़े शुभ-अशुभ के संकेत हैं। पुरुष की दाई आंख फड़कना शुभ है और बाई आंख फड़कना अशुभ। स्त्री की बाई आंख फड़के तो शुभ है और दाई आंख फड़के तो अशुभ है। रावण की बाई फड़की तो उसे अशुभ के समाचार मिलने लगे और सीता जी की बाई आंख फड़की तो उन्हें शुभ समाचार मिलने लगे। जब हमारे शरीर मे इतना भेद है तो अन्य वस्तुओं में हम कितना भेद करे। क्षेत्र, काल, भव सबके अपने अपने प्रभाव होते है, कभी तुम्हारे लिए विपरीतता बने तो थोड़ा क्षेत्र टाल दो, थोड़ा काल टाल दो, थोड़ा सा स्थानांतरित करों, कोई न कोई फल मिलता है।
चूहे के समान कपड़े काटोगे तो द्वेष हो जाएगा
किसान ने साल भर मेहनत करके खेत को बोया, बोने के बाद बरसात नहीं हुई तो बीज गया या नहीं। अंकुर आ गया, उजाड़ हो गया तो। फल आ गया, ओले गिर गए तो ये रिस्क है बीज बोने में। फिर फसल काटकर खिलहान में गेंहू लाओ, पीसो, फिर बनाओ तब कंही दो रोटियों का आनंद आता है। बस व्यवहार ऐसा ही है, व्यवहार के लिए बहुत समय चाहिए, बहुत रिस्क है लेकिन व्यवहार के बिना निश्चय का आनंद नहीं सकता, जैसे रोटी बनाए बिना रोटी का आनंद नहीं आ सकता। गाड़ी से एक्सीडेंट होने के बाद भी आज तक गाड़ियां चलना बंद नहीं हुई। जिस जिसमें कष्ट है जरूरी नहीं कि वह त्यागने योग्य है। बस एक कला सीखना है, टेलर बनना है, चूहा नहीं। चूहे के समान कपड़े काटोगे तो द्वेष हो जाएगा, वस्तु मूल्यहीन हो जाएगी और सामने वाला दवाई डालकर तुम्हे मार डालेगा। इस दुनिया या परिवार को चूहा बनकर मत काटना। एक विचार बनाओ कि जब भी धर्म का कार्य आएगा, हम सब मिलकर करेंगे।













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