रामगंजमंडी में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने रविवार को मंगल प्रवचन में कहा कि जीवन की सारी समस्याएँ मन से जुड़ी हैं। जब मन बिगड़ता है तो काम भी बिगड़ते हैं, और जब मन नियंत्रित होता है तो साधना व जीवन सफल होता है। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की खास रिपोर्ट…
रामगंजमंडी में रविवार को परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने अपने प्रवचन का केंद्र “मन की सफाई” को बनाया और समझाया कि मन से अशुभ और अवांछित विचारों को दूर करना ही सच्चा धर्म है।
गुरुदेव ने कहा कि धर्म, ध्यान और साधना की सारी बागडोर मन पर टिकी है। यदि मन सही दिशा में है तो काम भी सफल होंगे, और यदि मन अस्थिर हो गया तो हर कार्य बिगड़ने लगता है। मन को सही दिशा देने के लिए जरूरी है कि हम अपनी लगन को सही स्थान पर लगाएँ। उन्होंने समझाया कि लगन से मन स्थिर होता है और आत्मबल बढ़ता है।
वचन और काय पर भी नियंत्रण स्थापित जरूरी
उन्होंने श्रद्धालुओं को आने वाले दसलक्षण पर्व की ओर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा दी और कहा – “पर्वों से मन को खुराक दो, तभी वचन और काय पर भी नियंत्रण स्थापित होगा।”
आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि वचन और काय का कंट्रोल तो साधारणतया समझ आता है, लेकिन मन का नियंत्रण कठिन है। इसके लिए अभ्यास आवश्यक है – “मन जो कहे, उसे मत मानो। बार–बार जब मन की नहीं मानोगे, तब मन समझ जाएगा कि इसे नियंत्रित करना ही होगा।”
प्रवचन में उन्होंने राग–द्वेष पर भी प्रकाश डाला और कहा कि आवश्यकता से अधिक राग आफत बन जाता है। अतिराग शरीर, मानसिकता और गृहस्थी – तीनों को हानि पहुँचाता है। साधना मार्ग में भोजन का संतुलन विशेष महत्व रखता है। भोजन को धीरे–धीरे चबाने की आदत स्वस्थ शरीर और सशक्त साधना दोनों के लिए आवश्यक है।
आत्ममंथन और साधना मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा का स्रोत
उन्होंने कहा – “मन का काम हेय–उपादेय का परिचय कराना है। यह हमें अच्छे और बुरे का संकेत देता है। लेकिन हम अक्सर बुराई को समझने में चूक जाते हैं और केवल लाभ की ओर देखते हैं। धर्म ध्यान कभी दबाव में नहीं होता, यह तभी संभव है जब मन प्रमुदित और प्रसन्न हो।”
अंत में उन्होंने कहा कि संसार में अच्छाई और बुराई हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करती। जो अच्छा है वह अच्छा है और जो बुरा है वह बुरा ही रहेगा। धर्म पर्व हमें चिंतन और साधना के द्वारा धर्मात्मा बनाए रखते हैं। यह प्रवचन श्रोताओं के लिए आत्ममंथन और साधना मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा का स्रोत बना।













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