रामगंजमंडी नगर में चातुर्मास के दौरान आचार्यश्री विनिश्चय सागर जी की धर्मसभा में धर्म, समाज, विज्ञान के अलावा संयम, समर्पण आदि के बारे में दिव्य ज्ञान बंट रहा है। इसका धर्मलाभ यहां के समाजजन ले रहे हैं। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज ने कहा मानव का मस्तिष्क सर्वांग होता है। समर्पण के क्षेत्र में सबसे पहले मस्तिष्क को ही झुकाना पड़ता है। कोई व्यक्ति कितना भी कुछ कर ले सिर न झुकाए तो उसका समर्पण स्वीकार नहीं होता और वह कुछ भी ना करें मात्र सिर झुका ले तो यह उसका समर्पण स्वीकार हो जाता है। सिर यहां-वहां नहीं झुकना चाहिए। किसी ऐरे-गैरे चमत्कारी विद्याओं के बल पर जो लोगों को प्रभावित करते हैं, वहां नहीं झुकना चाहिए। यह मस्तक वहां झुकना चाहिए, जहां किसी प्रकार का कोई चमत्कार न हो। उन्होंने कहा कि आप जैसे लोग विद्याओं के बल पर चमत्कार करते हैं और आप जैसे ही लोग चमत्कार से प्रभावित हो जाते हैं।
प्रभावित हो जाते मस्तक ऐसी जगह झुक जाता है, जहां पर नहीं झुकना था। जहां पर अंधविश्वास वहां पर आपका मस्तिष्क झुक जाता है। दो ही चीजे है एक अंधविश्वास एक आत्मविश्वास। बाहर में जो कुछ भी आपको दिख रहा है उसमें अंधविश्वास हो सकता है, अंतस चेतना में जो उपलब्धि होती है उसमें आत्मविश्वास हो सकता है।
अंधविश्वास सही नहीं भटकाने वाला होता है
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन आत्मविश्वास की बात करता है, अंधविश्वास को नकारता है। समझदार पढ़ा-लिखा व्यक्ति वह किसी भी धर्म का हो वह भी यही कहता है कि अंधविश्वास सही नहीं है। यह भटकाने वाला होता है। यह लोगों की आस्था को गलत जगह स्थापित कर देता है। मूढ़ नहीं होना चाहिए कोई पढ़ा लिखा न हो चलेगा, कोई पढ़ा लिखा होकर मूढ़ हो तो यह नहीं चल सकता। आज के समय में पढ़े लिखे लोग मूढ़ हैं। साइंस को पढ़ रहे हैं फिर भी अंधविश्वास पर उनकी आस्था है,
विज्ञान धर्म के बिना हो ही नहीं सकता
जैन दर्शन और विज्ञान के अनुसरण पर बोलते हुए गुरुदेव ने कहा है कि विज्ञान का जो भी अनुसरण है, वह जैन धर्म का अनुसरण ही है। विज्ञान जो भी आविष्कार करेगी प्रयोग करेगी वह जैन दर्शन की किसी न किसी पर्याय से लिया होगा। विज्ञान का सबसे ज्यादा फोकस पुदगल पर होता है। पुदगल की शक्तियां असीम होती है। इसे वैज्ञानिक आविष्कार करते जाइए, करते जाइए लेकिन, इसकी शक्तियां समाप्त नहीं होती। वैज्ञानिक आविष्कार से जितनी भी चीज हमारे आसपास घर में हैं। यह सब चमत्कार पुदगल का है। विज्ञान की दुहाई देकर हम धर्म से अलग होते जा रहे हैं लेकिन, विज्ञान धर्म के बिना हो ही नहीं सकता। धर्म का विशेष ज्ञान विज्ञान है। ऐसे पढ़े-लिखे लोग विज्ञान को पढ़ने वाले लोग अंधविश्वास की ओर झुक गए हैं। वह इसलिए झुक रहे हैं क्योंकि, उनका विश्वास चमत्कार पर है अंधविश्वास पर है, लोग सही बात को न समझ रहे हैं न दूसरों को समझा रहे हैं।
अज्ञानता है कि आप अमृत को विष कह रहे हो
जीव को अगर संसार में कोई भटका रहा है तो वह मिथ्यात्व है। अगर कहीं जाने से काम बनते तो लोग पुरुषार्थ क्यों करते हैं, लोग दुकान व्यापार नौकरी क्यों करते । भ्रांति हो सकती वहां जाना हुआ सुख साता का उदय हुआ और काम बन गया। हमने यह समझ लिया वहां जाने से यह काम हुआ। कोई विष को अमृत कहे तो आप नहीं मानोगे कोई अमृत को विष कहे तब भी नहीं मानोगे और मान रहे हैं तो आपकी बुद्धि काम नहीं कर रही है, अज्ञानता है कि आप अमृत को विष कह रहे हो। भगवान के सामने मांगो मत नहीं मांगोगे तो वह मिलेगा जिसकी कोई सीमा नहीं है। न उनको कुछ देना न आपको कुछ लेना आपको अंदर उस शक्ति को जगाना है। जिससे सब आपको मिल जाए।













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