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श्री कल्पद्रुम महामंडल विधान के छठे दिन बच्चों ने दी मंगलाचरण की आकर्षक प्रस्तुति : हम अपनी संस्कृति छोड़ पाश्चात्य संस्कृति की ओर न बढ़ें – मुनिश्री पूज्य सागरजी


अंतर्मुखी मुनि श्री 108 पूज्य सागरजी महाराज ने मां अहिल्या की नगरी के पश्चिम क्षेत्र स्थित अतिशयकारी नवग्रह जिनालय ग्रेटर बाबा में चल रहे श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के छठे दिन प्रवचन के दौरान कहा कि अपना यह देश ऐसा देश है, जहां आराध्य तीर्थंकरों का जन्म हुआ है। हम अपने जीवन को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के पुरुषार्थ से आगे बढ़ा सकते हैं। आज की युवा पीढ़ी को भौतिक साधनों की जानकारी है लेकिन वह संस्कार -संस्कृति से कोसों दूर होती जा रही है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। जीवन बहुत ही अप्रत्याशित है, हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। जैन धर्म के सिद्धांतों तो भूल गए हैं, हम आने वाली पीढ़ी को पंथवाद-संतवाद के चक्रव्यूह में ढकेलते जा रहे हैं। आपका बच्चा भले सब कुछ जानता होगा लेकिन तीर्थंकरों के नाम एवं चिह्न तक उसे पता नहीं होंगे। जीवन में कुछ मांगना है तो यह मांगना कि हम अपनी आराधना से अपने समाज-देश के संस्कार, संस्कृति को बचा सकें।

यह बात अंतर्मुखी मुनि श्री 108 पूज्य सागरजी महाराज ने मां अहिल्या की नगरी के पश्चिम क्षेत्र स्थित अतिशयकारी नवग्रह जिनालय ग्रेटर बाबा में चल रहे श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के छठे दिन प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि अपना यह देश ऐसा देश है, जहां आराध्य तीर्थंकरों का जन्म हुआ है। हम अपने जीवन को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के पुरुषार्थ से आगे बढ़ा सकते हैं। आज की युवा पीढ़ी को भौतिक साधनों की जानकारी है लेकिन वह संस्कार -संस्कृति से कोसों दूर होती जा रही है।

आज हम शादी-ब्याह जैन सिद्धांतों के आधार पर क्यूं नहीं कर रहे हैं? शादी के बाद संस्कार-संस्कृति बदल जाती है, जैन संस्कृति का पहनावा भी बदलता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जैसा आचरण करोगे, वैसा ही भव मिलेगा। धार्मिक अनुष्ठान तो बहुत होते हैं लेकिन ऐसे धार्मिक व्यक्ति का सम्मान नहीं कर सकते जो जैनत्व को बचा रहा है। आज हम साधना-आराधना करने वाले व्यक्ति को नजरअंदाज कर देते हैं।

आज की संस्कृति को देखें तो जैन समाज भी दो भागों में बंटता जा रहा है, एक तामसी प्रवृत्ति और दूसरी संपूर्ण शाकाहारी प्रवृत्ति। आज अपनी संस्कार-संस्कृति को छोड़ने वालों ने जैन धर्म के सिद्धांतों को हड़प लिया है। यदि जैनत्व के सिद्धांत नहीं बचे तो जिनेन्द्र देव की आराधना भी हम नहीं कर सकेंगे।

मुनि श्री ने कहा कि मेरा आप सभी से अपने संस्कार-संस्कृति को बचाने का निवेदन है, कहीं बहुत देर न हो जाए और हम अपने जैनत्व को खोते हुए आने वाली पीढ़ी को अपने नाम के आगे जैन लगाने का मौका तक न दें।

अष्ट द्रव्य से की अर्चना

प्रातः काल में सूर्य की प्रथम किरण के साथ प्रतिष्ठाचार्य विनोद पगारिया, पंडित किर्तेश जैन के सानिध्य में तीर्थंकरों की 64 ऋद्धि की, सर्व साधु की तथा आर्यिकाओं की अष्ट द्रव्य और श्रीफल चढ़ा कर महार्चना की गई। इसमें कमल-रश्मि बडवाह परिवार ने शांतिधारा के साथ दिन की शुरुआत की। संगीतमय वातावरण में कशिश जैन एवं चहेती जैन, स्मृति नगर के साथ उन्मुक्त आनंद मानव सेवा संस्थान, कालानी नगर के बच्चों ने मंगलाचरण की आकर्षक प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर दीप प्रज्वलन का अवसर हेमंत सेठ, संजय शाह परिवार बांसवाड़ा को मिला। मुनिश्री के पाद प्रक्षालन का लाभ महोत्सव समिति के प्रमुख नरेन्द्र- शकुन्तला वेद परिवार ने लिया। जिनवाणी भेंट का लाभ जय जिनेन्द्र महिला मंडल, अंजनी नगर एवं सुनील जैन बडवाह परिवार ने लिया।

श्रीफल भेंट कर लिया आशीर्वाद

विधान में गांधी नगर महिला मंडल, व्यंकटेश नगर महिला मंडल, नंदा नगर महिला मंडल, किशनपुरा महिला मंडल, सुखलिया महिला मंडल के साथ-साथ मुनिश्री की जन्मस्थली पिपलगोन के दिगंबर जैन समाज ने मुनिश्री के समक्ष श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद लिया।

समाज श्रेष्ठी डॉक्टर देवेन्द्र जैन, विजय जैन, मुकेश टोंग्या ने मुनिश्री के समक्ष श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

कराया नामकरण

इस शुभ अवसर पर नरेश कुमार जैन (कपटी परिवार) ने अपने नवजात पुत्र के नामकरण संस्कार की विधि भी गुरुदेव के आशीर्वाद एवं मुखारविन्द से करा कर धर्मामयी माहौल में चार चांद लगा दिए।

महोत्सव समिति के प्रफुल्ल जैन व हितेश कासलीवाल ने बताया कि विधान के अंतिम कुछेक दिनों में श्रावकगणों में धर्मलाभ लेने की होड़ लगी हुई है। सभी श्रावक अपने-अपने परिजनों से विधान में आकर धर्मलाभ लेने का आह्वान कर रहे हैं।

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