सिद्धचक्र महामण्डल विधान के दूसरे दिन जैन बगीची में धर्म सभा को सम्बोधित करते स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि मनुष्य को सदैव अपने वेद, पुराण एवं शास्त्रों का अध्ययन करते रहना चाहिए। इससे हमारा आत्मबल तो बढ़ता ही है, साथ ही हमें संस्कार भी प्राप्त होते हैं। पढ़िए मनोज नायक की विस्तृत रिपोर्ट…
मुरैना। हम सभी सांसारिक प्राणियों को अनेक भवों के पुण्य से मानव पर्याय मिला है। अब हमारा यह कर्तव्य है कि संसार में रहते हुए भी कुछ ऐसे कार्य करें कि अन्य सभी लोग यहां तक कि साधु संत भी हमें याद करते रहें। मनुष्य को सदैव अपने वेद, पुराण एवं शास्त्रों का अध्ययन करते रहना चाहिए। इससे हमारा आत्मबल तो बढ़ता ही है, साथ ही हमें संस्कार भी प्राप्त होते हैं। जिस मनुष्य के अंदर भक्ति की भावना और संस्कार नहीं हैं, ज्ञान और ध्यान के संस्कार नहीं हैं ऐसा मनुष्य साधु बनने कर बाद भी घर-गृहस्थी की ही चर्चा करेगा, न कि धर्म की। हमें पुण्यशाली जीवों का अर्थात् अपने इष्टदेवों का सदैव स्मरण करते रहना चाहिए। ऐसा करने से हमारा आत्मबल तो बढ़ता ही है, साथ ही हमें संस्कारों की प्राप्ति भी होती है। ये उदगार जैन साध्वी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने जैन बगीची में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये।

समझाया विधान का सार
आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान के दूसरे दिन सिद्धचक्र विधान के सार को समझाते हुए जैन साध्वी ने कहा कि सती मैना सुंदरी के चरित्र से हमें शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। सती मैनासुंदरी ने गृहस्थ अवस्था में रहकर भी अपने मानव जीवन को सार्थक किया। अंत में मैना सुंदरी ने आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर स्वर्ग में गईं और श्रीपाल ने मोक्ष प्राप्त किया। सभी मनुष्य अपने अपने इष्ट का स्मरण करते हैं। कोई अरिहंत को याद करता है, कोई राम को याद करता है, कोई कृष्ण को याद करता है, लेकिन मनुष्य पर्याय को सार्थक बनाने के लिए हम गृहस्थ अवस्था में भी कुछ ऐसे कार्य करें कि साधु संत भी हमें याद करते हुए अन्य लोगों के सामने हमारा उदाहरण पेश करें। ऐसा ही उदाहरण सती मैना सुंदरी और श्रीपाल ने प्रस्तुत किया था।
इन्हें मिला सौभाग्य
कार्यक्रम से पूर्व शांतिधारा करने का सौभाग्य अजयकुमार दीपककुमार जैन (मंगलम ज्वेलर्स) मुरैना एवं दीप प्रज्वलन करने का सौभाग्य राजेन्द्रकुमार आशीष जैन (पारस कलेक्शन) धौलपुर को प्राप्त हुआ। मंचासीन गणिनी आर्यिका श्री लक्ष्मीभूषण, श्री स्वस्तिभूषण, श्री अंतसमती माताजी को साधना राजेन्द्र जैन धौलपुर ने जिनवाणी भेंट की। महाआरती करने का सौभाग्य सौधर्म इंद्र अनिल-सुलोचना जैन, सुभाषनगर, मुरैना को प्राप्त हुआ।













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