ऋषभदेव की निर्वाण भूमि अष्टापद में प्राचीन चरण के जलाभिषेक एवं शांतिधारा समाजजनों ने की। यह सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ। श्रमण संस्कृति से देवभूमि उत्तराखंड का महत्वपूर्ण इतिहास जुड़ा हुआ है। इंदौर और /अष्टापद से पढ़िए, यह खबर…
इंदौर/अष्टापद। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के सदस्य एवं समर्थ सिटी के समाजजन प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव की निर्वाण भूमि अष्टापद दर्शन वंदना करने पहुंचे। बद्रीनाथ मंदिर में अति प्राचीन प्रतिमा के प्रातः कालीन दर्शन का लाभ प्राप्त किया। इसके बाद भगवान आदिनाथ स्वामी के हजारों वर्ष प्राचीन चरणों का जलाभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य शैलेन्द्र जैन, अनिल जैन, संतोष जैन आदि सदस्यों को प्राप्त हुआ। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि अष्टापद तीर्थ वह पर्वत है। जिस पर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया था और इसे सबसे पवित्र जैन तीर्थ माना जाता है। अष्टपद का शाब्दिक अर्थ है आठ सीढ़ियां, जो पहाड़ पर चढ़ने के लिए आठ विशाल सीढ़ियां या आठ पर्वत चोटियों की एक श्रृंखला मानी जाती हैं। हिमालय का क्षेत्र भगवान आदिनाथ स्वामी की साधना स्थली मानी जाती है।
हिमालय को अष्टापद भी कहा जाता है
आठ पहाड़ियों की बात के संदर्भ में बताया गया है कि बद्रीनाथ के आसपास की पहाड़ियों की श्रृंखलाएं विद्यमान हैं। जिसमें गौरीशंकर, कैलाश मान सरोवर, बद्रीविशाल, नंदा, द्रोणगिरि, नारायण, नर, और त्रिशूली के नाम से जाना जाता है। इन आठ पहाड़ियों के कारण हिमालय को अष्टापद भी कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि अष्टापद कैलाश पर्वत और मानसरोवर के आसपास स्थित है। हालांकि यह सभी खोज का विषय है लेकिन, जैन धर्मावलंबियों की आस्था बद्रीनाथ एवं मानसरोवर पर अधिक है। इस बारे में खोजें हुईं हैं, जो अब भी जारी है कि वह
कौन-सा स्थान है जहां से प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ स्वामी ने मोक्ष की प्राप्ति की थी। यह बात तय मानी जाती है कि उनकी साधना स्थली हिमालय ही है।
जैन इतिहास में अष्टापद को सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है इसलिए, पिछले कई वर्षों से इसके स्थान पर निरंतर शोध चल रहा है।
…इससे अधिक सुंदर स्थान कभी नहीं देखा
अब तक एकत्रित जानकारी पर दर्जनों शोधपत्र लिखे जा चुके हैं और कई पुस्तिकाएं प्रकाशित हो भी हो चुकी हैं। एक अन्य ख़ोज जो एक अंग्रेज शोधकर्ता जोसेफ रॉक ने दावा किया था कि आधुनिक समय में अष्टापद को देखने वाला वह पहला व्यक्ति था और उसके अनुसार उसने पूरी दुनिया में इससे अधिक सुंदर स्थान कभी नहीं देखा। उन्होंने कहा कि ‘यदि अष्टापद के बारे में पर्याप्त गहन शोध किया जाए, तो शायद हम मानव सभ्यता के स्रोत तक पहुंच सकते हैं। यह संभव है कि इस क्षेत्र में मानव का विकास न हुआ हो, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ऐसा स्थान होगा, जहां सभ्यता की शुरुआत हुई।
आदिनाथ स्वामी के अति प्राचीन चरण हैं
यह बात स्वतंत्रता प्राप्त के पूर्व वर्ष 1930 की है।
आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज द्वारा आज से लगभग 50-55 वर्षों पूर्व अष्टापद यात्रा के दौरान अष्टापद पर्वत श्रृंखलाओं में साधना करते हुए ख़ोजे गए भगवान श्री आदिनाथ स्वामी के अति प्राचीन चरण हैं। यह जानकारी अष्टापद जैन भवन के महामंत्री कीर्ति पांड्या ने दी। ज्ञातव्य है कि अष्टापद चौबीसी चरण तीर्थ क्षैत्र के विकास में देवकुमार, प्रदीप, अमित कासलीवाल परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।













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