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विपत्ति के समय धैर्य रखने से समस्याओं का हलः मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज

न्यूज़ सौजन्य राजेश दद्दू

इंदौर। संसार में नाना प्रकार के जीव हैं, उनकी नाना प्रकार की परिणति है लेकिन जीव के चित्त की जो नाना परिणति है, वह जिन वाणी के श्रवण से शांत होती है। संसार में पग- पग पर विपत्ति है, एक समाप्त होती है दूसरी खड़ी हो जाती है। विपत्ति सब पर आती है और आने पर कुछ बिखर जाते हैं और कुछ निखर जाते हैं। विपत्ति व्यक्ति के विपरीत स्वभाव के कारण ही आती है और स्वभाव के बदलने पर समाधान पाती है। विपत्तियों से निवृत्ति के लिए समता और धैर्य के साथ अपने परिणामों को बदलें, स्वभाव को बदलें।
ये उद्गार मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने मंगलवार को समोसरण मंदिर, कंचन बाग में इष्टोपदेश ग्रंथ की गाथाओं पर प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कर्मोदय ही विपत्ति है। जब कर्म उदय में आते हैं, तब विपत्ति आती है। ऐसे समय धैर्य रखना और अपने परिणामों को विकृत मत करना। जब पंच परमेष्ठी, जैनधर्म पर, तीर्थों पर एवं गुरु पर विपत्ति आए तो संगठित होकर अहिंसक तरीके से विपत्ति दूर करने का प्रयास करना।
इस अवसर पर टी के वेद, अरुण सेठी, आजाद जैन, डॉक्टर जैनेंद्र जैन, विमल गांधी एवं गौतम जैन आदि गणमान्य उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।

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