रामगंजमंडी में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने प्रवचन में मायाचारी और तिर्यंच गति के दुखों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मन, वचन और क्रिया में स्पष्टता जरूरी है। मायाचारी के कारण जीव तिर्यंच गति का बंध कर लेता है। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की खास रिपोर्ट…
रामगंजमंडी में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने प्रवचन में तिर्यंच गति और मायाचारी के विषय में कहा कि तिर्यंच गति में केवल दुख ही दुख है। इस गति से बचने के लिए हमें स्पष्ट और सत्य बोलना होगा, मायाचारी का त्याग करना होगा।
उन्होंने कहा कि जब धर्म हृदय में आता है तो मायाचारी स्वतः दूर हो जाती है, लेकिन यदि धर्म हृदय में नहीं उतरे तो व्यक्ति कुटिलता और छल-कपट में रम जाता है। मन में कुछ और वचन में कुछ कहना, ठगना-छलना और कुटिल भाव ही मायाचारी है। आचार्य श्री ने बताया कि व्यवहार को बनाए रखने के चक्कर में हम धर्म बिगाड़ बैठते हैं, जिससे तिर्यंच गति का बंध होता है। उन्होंने रावण का उदाहरण देते हुए समझाया कि मायाचारी का परिणाम अंततः अपमान ही होता है।
हर क्षण आत्मोत्थान के लिए उपयोग करना चाहिए
उन्होंने कहा कि जीवन का बजट संभालना आना चाहिए, हर क्षण आत्मोत्थान के लिए उपयोग करना चाहिए। बच्चों को भी स्पष्ट बोलना और संस्कारित करना जरूरी है। केवल प्रेम नहीं बल्कि संस्कार भी आवश्यक हैं।
आचार्य श्री ने संदेश दिया कि जीवन में ऐसे कार्य करें जिससे तिर्यंच गति न मिले। मायाचारी छोड़कर स्पष्ट और सच्चे जीवन का अनुसरण करें।













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