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आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज का हुआ विहार : बैंड-बाजे के साथ भव्य जुलूस निकाला गया


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ का प्रभात नगर सेक्टर 5 से मंगल बेला में सेक्टर 11 के लिए विहार प्रारंभ हुआ। कृषि उपज मंडी पर श्री आदिनाथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा समिति एवं संपूर्ण सकल दिगंबर जैन समाज उदयपुर द्वारा संघ का भव्य स्वागत किया गया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…


उदयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ का प्रभात नगर सेक्टर 5 से मंगल बेला में सेक्टर 11 के लिए विहार प्रारंभ हुआ। कृषि उपज मंडी पर श्री आदिनाथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा समिति एवं संपूर्ण सकल दिगंबर जैन समाज उदयपुर द्वारा संघ का भव्य स्वागत किया गया। जलूस के प्रारंभ में बैंड बाजे के बाद आगवानी के लिए हाथी, घोड़े, बग्घी पर भगवान एवं पूर्वाचार्यों तस्वीर शोभायमान हो रही थी। महिलाएं मंगल कलश धारण कर जैन समाज के महिला बैंड के धार्मिक भजनों पर नृत्य कर वातावरण को धर्ममय बना रही थीं।

संतोष है आपके भीतर

आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन में बताया कि शाश्वत नश्वर संसार के अंदर रहने वाले सभी जीव सुख की कामना करते हैं। अभी विहार के दौरान संतोष नगर में भी देखने में आया कि संतोष नगर में भी संतोष नहीं है। शाश्वत और संतोष आपके भीतर आत्मा में है। चारों गति में आप भ्रमण करते हुए सुख और दुख अनुभव करते हैं। क्षणिक सुख शाश्वत नहीं है और यह शरीर भी शाश्वत नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ दिनों के बाद पंचकल्याणक प्रतिष्ठा यहां होगी। इसके पूर्व 1996 काफी वर्ष पहले इसी सेक्टर 11 में संघ का विहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश होते हुए राजस्थान में हुआ था। तब भी ज्येष्ठ का महीना था। इस बार ज्येष्ठ का महीना है। लगता है सेक्टर 11 या उदयपुर वालों को गर्मी ज्यादा पसंद आती है। संयम और धर्म रूपी वातानुकूलित पदार्थ से आप आत्मज्ञान भीतर महसूस कर सकते हैं। सिर्फ तप और संयम का स्विच खोलना है, तब आपको वातानुकूलित अनुभव होगा।

जीवन की आकुलता दूर करें

आचार्य श्री ने कहा कि जितने भी तीर्थंकर भगवान मोक्ष गए हैं। सब ने अपनी आत्मा को आत्मानुकूल बनाया है अर्थात् आत्मा के अनुकूल बनाया है। आप भी जीवन को कुलकुल करें, तभी आप आकुलता दूर होगी। इसलिए जिनालय और देव शास्त्र गुरु का आदर्श आपके सामने हैं, सभी तीर्थंकरों का जीवन एक समान होता है। उन्होंने संचित सातिशय पुण्य और पुरुषार्थ से सिद्धालय को प्राप्त किया है। एक आत्मा में अनेक आत्मा समाहित होती है। पंचकल्याणक आमोद-प्रमोद या खाने-पीने का मेला नहीं है। अनेक भव के परिभ्रमण के बाद जो तीर्थंकर भगवान मोक्ष जाते हैं। उनके गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक के पांच दिनों को नाटकीय रूप से दिखाया जाता है। तीर्थंकरों के जीवन से संयम तप सीखने का यह महोत्सव है।

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