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आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में वीर शासन जयंती मनी : भगवान महावीर की वाणी हमें शास्त्रों के माध्यम से प्राप्त होती है


आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में वीर शासन जयंती पर्व मनाया गया। सर्वप्रथम श्रीजी अभिषेक शांतिधारा की गई। एक साथ 24 मंडलों पर महावीर महामंडल विधान किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में वीर शासन जयंती पर्व मनाया गया। सर्वप्रथम श्रीजी अभिषेक शांतिधारा की गई। एक साथ 24 मंडलों पर महावीर महामंडल विधान किया गया। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने वीर शासन जयंती का महत्व बताते हुए बताया कि शासन का मतलब होता है, जिसके प्रति हमारा समर्पण है। जिसकी आज्ञा में हम रहते हैं तो वह शासन होता है। उन्होंने समझाते हुए कहा कि ऐसा शासन होता है जो व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व होता है। जिनका एवं व्यक्तित्व कृतित्व होता है। ऐसे भगवान महावीर के शासन को हम स्वीकार करते हैं। आज का दिन था जब महावीर स्वामी के सर्वांग से दिव्य ध्वनि खिरी हमें मोक्ष मार्ग मिला और वास्तविकता के स्वरूप का वस्तु स्वरूप का ज्ञान हुआ। जिनेंद्र भगवान की वाणी से ही हमें सम्यक दर्शन प्राप्त होगा। भगवान महावीर की वाणी हमें शास्त्रों के माध्यम से प्राप्त होती है। जो जिनेंद्र भगवान की वाणी है। जिनवाणी तीर्थंकर भगवान की वाणी है धर्म उपदेश के बिना कल्याण नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि जिसमें जो योग्यता है वही कार्य होगा, जो नहीं होगा, वह नहीं होगा। 130 करोड लोगों को प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो क्या होगा। प्रधानमंत्री एक ही बन पाता है। उपादान शक्ति जिसमें होती है वही बन पाता है। जिसकी जितनी उपादान शक्ति है। वो वही बन पाता है। हमें आता कुछ नहीं प्रदर्शन ज्यादा करता है। यह व्यक्ति की सबसे बड़ी कमी है। हम जितना प्रदर्शन करते हैं, व्यक्ति को उससे कम आता है।

लोग अहंकार के कारण ठगे जाते है

इंद्रभूती गौतम के बारे में बताते हुए कहा कि वह अपने आप को सर्वज्ञ मानता है। धर्मात्मा व्यक्ति कभी भी अपने आप को सर्वज्ञ नहीं कहेगा, जो अपने आप को ज्ञानी समझते हैं वह ज्ञानी नहीं होते। आचार्य श्री ने कहा कि आज संपूर्ण विश्व में 99 प्रतिशत लोग अहंकार के कारण ठगे जाते हैं। अहंकार को आप समझ नहीं पाते हैं और ठगे जाते हैं। गौतम ने भगवान महावीर स्वामी को धोखेबाज घोषित कर दिया था। इंद्र ने गौतम के अहंकार को ठेस पहुंचाई और वह भगवान महावीर स्वामी के समवशरण में 501 शिष्यों को लेकर समवशरण की ओर निकल गया और मानस्तंभ के सामने जाते ही गौतम का मान गलित हुआ और वह मुनि बनकर गौतम गणधर हो गया। प्रभु की दिव्य ध्वनि खिरी और महावीर स्वामी को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ और हमें जिनवाणी का ज्ञान हुआ इसी पर्व को हम वीर शासन जयंती के रूप में मनाते हैं। हम शरीर और आत्मा को एक मान रहे हैं। शरीर और आत्मा एक नहीं हो सकते, यह आत्मा चेतन है और ज्ञान दर्शन है। उन्होंने कहा आचार्य श्री ने जब मुझे दीक्षा दी। तब उन्होंने मुझसे कहा कि जहां तुम जा रहे हो प्रभावना तो कर सकते हो, लेकिन अप्रभावना मत करना।

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