पंचम पट्टाचार्य, वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित टोंक में विराजमान हैं। उनके सानिध्य में अकंपनाचार्य एवं विष्णु मुनिराज सहित 700 मुनिराजों का पूजन सम्पन्न हुआ तथा 1008 श्री श्रेयांसनाथ भगवान को निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की विशेष रिपोर्ट…
टोंक। पंचम पट्टाचार्य, वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित टोंक में विराजमान हैं। उनके सानिध्य में अकंपनाचार्य एवं विष्णु मुनिराज सहित 700 मुनिराजों का पूजन सम्पन्न हुआ तथा 1008 श्री श्रेयांसनाथ भगवान को निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि हस्तिनापुर में 700 मुनिराजों पर जो उपसर्ग हुआ था, उसका संबंध रक्षाबंधन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से है। आज का दिन बंधनों से मुक्त होने का प्रतीक है, और प्रत्येक जीव संसार के बंधन से मुक्त होना चाहता है। 11वें तीर्थंकर श्री श्रेयासनाथ भगवान ने इसी दिन पुरुषार्थ के बल पर निर्वाण-मोक्ष प्राप्त किया था।
आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि निर्वाण प्राप्ति के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र – रत्नत्रय मार्ग आवश्यक है। सम्यक दर्शन के आठ गुण होते हैं, जिनमें वात्सल्य गुण सर्वोपरि है, क्योंकि यह प्राणी मात्र के प्रति प्रेम और करुणा का संदेश देता है। उन्होंने उज्जैनी नगरी की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि हस्तिनापुर में राजा बलि द्वारा किए गए उपसर्ग को महामुनि विष्णु कुमार ने विक्रिया ऋद्धि के माध्यम से दूर किया था, और यह घटना रक्षाबंधन पूर्णिमा के दिन घटी थी।
तभी से इस पर्व को वात्सल्य पूर्णिमा भी कहा जाता है। आचार्य श्री ने एक अन्य प्रसंग में चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का उल्लेख किया, जिन्होंने संकट के समय दिल्ली के बादशाह हुमायूं को रक्षा-सूत्र भेजा था। हुमायूं ने वचन निभाते हुए रानी पद्मिनी एवं उनके राज्य की रक्षा की। इस प्रकार राखी केवल भाई-बहन के रिश्ते का ही नहीं, बल्कि धर्म, धर्मात्मा और संस्कृति की रक्षा का भी प्रतीक है। आचार्य श्री ने 20वीं सदी की एक ऐतिहासिक घटना का भी उल्लेख किया, जब आचार्य शांति सागर जी महाराज पर राजा खेड़ा में उपसर्ग हुआ था। जैन मंदिरों में विजातीय प्रवेश के विरोध में उन्होंने 1105 दिनों तक अन्न का त्याग किया। न्यायालय का फैसला जैन समाज के पक्ष में आने पर उन्होंने रक्षाबंधन के दिन ही अन्न ग्रहण किया।
लाडनूं (राजस्थान) के गंगवाल परिवार द्वारा इस धर्मयुद्ध में तन-मन-धन से योगदान देने की प्रेरणादायक कथा भी आचार्य श्री ने सुनाई। उन्होंने कहा – “राखी का पर्व तभी पूर्ण होगा जब हम धर्म, धर्मात्मा और जिनालय की रक्षा का संकल्प लें।” इससे पूर्व विधान का आयोजन हुआ, जिसमें पुण्यार्जक परिवारों द्वारा 700-700 नारियल विधान में श्रीफल के रूप में अर्पित किए गए।













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