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पांच दिवसीय गुरु आराधना महोत्सव का दूसरा दिन : वर्णी ने जातिभेद को दूर कर पढ़ाया मात्र मानवता का पाठ- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर


विजय नगर के दिगम्बर जैन पंचबालयति पारमार्थिक एवं धार्मिक ट्रस्ट की ओर से आयोजित पांच दिवसीय गुरु आराधना महोत्सव के दूसरे दिन गणेशप्रसाद वर्णी की 150वीं जन्म जयंती मनाई गई। कार्यक्रम में सान्निध्य अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज एवं आशीर्वाद आचार्य श्री विहर्षसागरजी महाराज का रहा। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि गणेशप्रसाद वर्णी ने अपने जीवन में अनेक कुरीतियों को दूर कर समाज को धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों से जोड़ा। पढ़िए ये विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। विजय नगर के दिगम्बर जैन पंचबालयति पारमार्थिक एवं धार्मिक ट्रस्ट की ओर से आयोजित पांच दिवसीय गुरु आराधना महोत्सव के दूसरे दिन गणेशप्रसाद वर्णी की 150वीं जन्म जयंती मनाई गई। कार्यक्रम में सान्निध्य अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज एवं आशीर्वाद आचार्य श्री विहर्षसागरजी महाराज का रहा। कार्यक्रम का प्रारम्भ मंगलाचरण, चित्रानावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके साथ ही सबसे पहले भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज एवं मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज की पूजा की गई।

इन्हें मिला सौभाग्य

मंगलाचरण करने का सौभाग्य रश्मि पाटनी को मिला। चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हुकमचंद सांवला, डॉ. पंचबालयति मंदिर के मंत्री अरविन्द जैन, डॉ. मुकेश जैन विमल, अभय जैन सी.ए., डॉ. ब्र. समता जैन ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अरविन्द जैन ने की। मुख्य अतिथि हुकमचंदजी सांवला रहे। कार्यक्रम का संचालन ब्र. जिनेश मलैया, विधि विधान ब्र. सुरेश मलैया द्वारा किया गया।

चलाया था सुसंस्कार देने का महायज्ञ

इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि गणेशप्रसाद वर्णी ने अपने जीवन में अनेक कुरीतियों को दूर कर समाज को धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों से जोड़ा। वर्णी ने मानवता को जागृत करने के लिए अनेक कार्यक्रम किये। उनका ऐसा मानना था कि भगवान की आराधना-उपासना जितनी जरूरी है, उतनी आवश्यकता उन व्यक्तियों का उद्धार करने की है, जो व्यसनों और मांसाहार में लगा है। ऐसे व्यक्तियों को वहां से निकालकर उनके अंदर भी मानवता व दयाधर्म का बीजारोपण किया जाए। मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति अपने कर्मों से ही सुख-दुख का भोग करता है। वर्णी ने जाति आदि के भेद को दूर कर मात्र मानवता का पाठ पढ़ाकर सबको एक समान शिक्षा और सुसंस्कार देने का महायज्ञ चलाया था। आज उनके द्वारा स्थापित संस्कृत महाविद्यालय से अनेक विद्वान निकलकर धर्म की ध्वजा फहरा रहे हैं।

संस्मरणों से डाला प्रकाश

मुख्य अतिथि हुकमचंद सांवला ने वर्णी का गुणानुवाद करते हुए अनेक संस्मरणों के माध्यम से उनके जीवन पर प्रकाश डाला तथा उनके द्वारा बनवाए विद्यालयों में वर्णी विद्यालय सागर, साढूमल, बनारस, बरुआ सागर आदि का उल्लेख किया। डॉ. अरविन्द जैन ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, न्याय आदि के विद्वान होने का श्रेय पूज्य गणेशप्रसाद वर्णी को जाता है। डॉ. मुकेश जैन विमल तथा डॉ. ब्र. समता दीदी ने भी विचार व्यक्त किए।

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