पर्युषण महापर्व के पावन अवसर पर सहारनपुर में दिगम्बराचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज ने कहा कि क्रोध समस्या का समाधान नहीं बल्कि स्वयं एक समस्या है, जबकि क्षमा हर समस्या का जीवंत समाधान है। पढ़िए सोनल जैन की ख़ास रिपोर्ट…
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पर्युषण महापर्व के शुभारंभ अवसर पर भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने उत्तम क्षमा धर्म पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पर्व का अर्थ है “जोड़” और दशलक्षण महापर्व मानव को उसके आत्मगुणों से जोड़ता है।
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा का स्वभाव क्षमा है, किन्तु मनुष्य क्षमा को भूलकर क्रोध का प्रदर्शन करता है और स्वयं दुखी होता है। वास्तव में क्षमा धर्म का पालन वीरों का कार्य है। क्रोध कभी भी समाधान नहीं, बल्कि स्वयं एक समस्या है। क्षमा हर समस्या का जीवंत समाधान है।
क्रोध आत्मा का शत्रु है
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म हमेशा धर्मी आत्मा के साथ रहता है। जब आत्मा में क्षमा का अनुभव होता है, तो वही क्षण आत्मा के निकट होने का है। क्रोध आत्मा का शत्रु है और यह सबसे पहले विवेक पर आक्रमण करता है। क्रोध क्षणिक होता है, पर उसका परिणाम जीवनभर का पश्चाताप होता है।
कुछ ही समय में क्रोध शांत हो जाएगा
आचार्य श्री ने क्रोध को जीतने का उपाय बताते हुए कहा कि जब कोई निमित्त बने तो मौन हो जाएं, और यदि स्थिति न संभले तो स्थान बदल लें। कुछ ही समय में क्रोध शांत हो जाएगा। उन्होंने कहा कि क्षमा में आत्मा ढलने से न केवल वर्तमान सुधरता है, बल्कि भव का क्षय करके आत्मा भगवान भी बन सकती है।













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