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की गई अभिषेक एवं शांतिधारा : काय का उपयोग करें साधुओं की वैयावृत्ति में- मुनि पूज्य सागर


 दिगम्बर जैन मंदिर क्लर्क कॉलोनी में अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। प्रचार प्रमुख प्रवीण जैन ने बताया कि मुनिश्री ने इस अवसर पर कहा कि मन, वचन, काय तीनों योग से कर्मों का आस्त्रव होता है। हमारी शरीर में जो बीमारी है, वह काय संबंधित कर्म का फल है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। दिगम्बर जैन मंदिर क्लर्क कॉलोनी में अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। प्रचार प्रमुख प्रवीण जैन ने बताया कि इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि मन, वचन, काय तीनों योग से कर्मों का आस्त्रव होता है। हमारी शरीर में जो बीमारी है, वह काय संबंधित कर्म का फल है। यदि हमें सुस्वर ध्वनि चाहिए तो भगवान और भगवान के भक्त तथा सभी के गुणों का अनुवादन करना चाहिए। काय संबंधी कर्मों के फल से बचने के लिए मुनियों के लिए भी बताया गया है कि कैसे बैठना, चलना, खाना और ध्यान करना चाहिए। काय का उपयोग अभिषेक, पूजा- पाठ, शास्त्र- प्रवचन, साधु की वैयावृत्ति में करना चाहिए। 148 कर्म में से 93 कर्म शरीर से संबंधित हैं।

भगवान की वेदी को मोर पंख से साफ करना भी अष्ट द्रव्य से पूजा करने की फल के बराबर है। मंदिर में हमेशा अष्टांग नमस्कार करना चाहिए। कार्यक्रम में आनंद गोधा, दिलीप बज, कमलेश जैन, संजय जैन, सपना जैन, सुभद्रा गोधा, पुष्पलता जैन, मधु जैन सहित अन्य समाज जन मौजूद थे।

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