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ज्ञान परंपरा मानव जाति को बचाने का माध्यम : 10 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न


आचार्य सिद्धसेन दिवाकर कृत सन्मति तर्क प्रकरण विषय पर 10 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन समारोह हुआ। इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा हुई। कई विद्वानों ने इसमें भाग लिया। लाडनूं से पढ़िए यह खबर…


लाडनूं। आचार्य सिद्धसेन दिवाकर कृत सन्मति तर्क प्रकरण विषय पर 10 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन समारोह समणी नियोजिका मधुरप्रज्ञा जी के सानिध्य में जैन विश्व भारती संस्थान के आचार्य महा श्रमण आडिटोरियम में हुआ। संस्थान के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म-दर्शन विभाग के तत्वावधान एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के प्रायोजकत्व में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दुगड़ ने कहा कि सन्मति तर्क प्रकरण के माध्यम से अनेकांत और स्याद्वाद का तार्किक विश्लेषण समझा जा सकता है। उन्होने कहा कि इन 10 दिनों में जैन न्याय और ज्ञान मीमांसा को समझने का जो प्रयास हुआ है, इससे ज्ञान की वृद्वि हुई है। उन्होंने कहा कि सत्य सापेक्ष होता है। सत्य को जानने का लक्ष्य ही व्यक्ति को ज्ञान तक ले जाता है।

प्राकृत ग्रंथों को समझें, भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाएं

कुलपति प्रो. दुगड़ ने ज्ञान परंपरा के विभिन्न विद्वानों की चर्चा करते हुए कि आप, मैं और हम सबके विचार जानने के बाद भी जो शेष रह जाता है, उसे मिलाने के बाद ही सत्य पूर्ण हो सकता है। समारोह के मुख्य अतिथि महर्षि वाल्मिकी विश्वविद्यालय हरियाणा के कुलपति प्रो. रमेशचंद भारद्वाज ने कहा कि सन्मति तर्क प्रकरण के विश्लेषण के माध्यम से आपका ज्ञानार्जन हुआ है। जरूरत है कि इस ज्ञान को माध्यम बनाकर प्राकृत ग्रंथों को समझकर भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढाने के लिए प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ज्ञान नहीं है बल्कि मानव जाति को बचाने और भविष्य के निर्माण का माध्यम है। प्रो भारद्वाज ने कहा कि मौलिक ग्रंथों को समझने के लिए तीन सूत्रों यथा काल को दृष्टिगत, वर्तमान संदर्भ एवं प्रांसगिकता और ज्ञान को प्रसारित करने का भाव का औचित्य होना चाहिए। इसके साथ ही आने वाली समस्या को समझने से ही ज्ञान की आराधना संभव है।

भगवान महावीर का एक नाम भी सन्मति था

सानिध्य प्रदान करते हुए समणी नियोजिका समणी मधुरप्रज्ञाजी ने कहा कि गंभीर अनुशीलन, सैद्धांतिक व्याख्या से ओतप्रोत समन्मति तर्क ग्रंथ वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं। 5वीं सदी का यह ग्रंथ आज भी सही दृष्टि प्रदान कर रहा है। उन्होंने ज्ञान परंपरा के आचार्यों की चर्चा करते हुए कहा कि भगवान महावीर का एक नाम भी सन्मति था। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि जैन विश्वभारती के पूर्व अध्यक्ष धर्मचन्द लूंकड थे।

कार्यशाला की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की

कार्यशाला के समन्वयक प्रो.आनंदप्रकाश त्रिपाठी ने दस दिवसीय कार्यशाला की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने हुए सभी समागतों का आभार भी व्यक्त किया। विभाग की प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने स्वागत वक्तव्य दिया। इस अवसर पर संभागी डाॅ.विजय जैन, संतोष जैन, जिनेंद्र जैन ने अपने अनुभव प्रस्तुत किए। मुमुक्षु रक्षा द्वारा प्रस्तुत मंगलगान से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। अतिथियों का स्वागत प्रो.रेखा तिवाड़ी, प्रो. बीएल जैन आदि ने किया। संयोजन डाॅ.सत्यनारायण भारद्वाज ने किया। कार्यशाला में देश भर से समागत विद्वतजनों को अतिथियों द्वारा प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

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