भोपाल (अवधपुरी) में दशलक्षण पर्व के तहत संस्कार शिविर चल रहा है। इसमें मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज मंगल देशना देकर धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। शिविर में संपूर्ण भारत से शिविरार्थी आए हैं। इन्हें मुनिराज के प्रवचनों का लाभ मिल रहा है। भोपाल अवधपुरी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
भोपाल(अवधपुरी)। यहां दशलक्षण पर्व के तहत संस्कार शिविर चल रहा है। इसमें मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज मंगल देशना देकर धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। शिविर में संपूर्ण भारत से शिविरार्थी आए हैं। इन्हें मुनिराज के प्रवचनों का लाभ मिल रहा है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि सभी शिविरार्थियों ने प्रातः5.30 बजे मुनिश्री के मुखारविंद से लगभग 30 मिनट का भावनायोग किया। इसके बाद भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। नित्य नियम पूजन के साथ पर्व पूजन एवं दशलक्षण विधान हुआ।
इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्मसभा में तपस्या का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि भोग विलास और मौज मस्ती सभी को अच्छी लगती है और त्याग तपस्या तथा संयम साधना से दूर भागते हैं,जबकि त्याग तपस्या और संयम साधना में ही जीवन की वास्तविकता है। मुनि श्री ने उत्तम तप धर्म पर चार शब्द प्रेय, श्रेय, हेय, ध्येय की व्याख्या करते हुए कहा कि जोअच्छा लगे वह प्रेय है और जो अच्छा बनाए वह श्रेय है। दुनिया प्रेय के पीछे पागल है, उसके पीछे भाग रहे हैं। वह सभी भोगी है,जो श्रैय के पीछे लग जाये वह योगी है।
वह आनंद से भर देता है यह श्रैय है।
मुनि श्री ने कहा कि प्रेय की यात्रा रेत के टीले पर चढ़ने के समान है। जिसमें मखमली अहसास होता है। यह अल्पकालिक ऊंचाई देता है लेकिन, उस पर टिक नहीं पाता, रेत खिसकती है और वह धड़ाम से नीचे आ जाता है। प्रेय क्षणभंगुर, विनाशक तथा मिट जाने वाला है। उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि किसी ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना, बड़ा कठिन होता है। एक-एक कदम संभल संभल कर चलना पड़ता है। एक कदम भी डगमगाए कि सीधे नीचे। उन्होंने कहा कि चढ़ना भले ही कष्टकारी हो लेकिन, एक बार व्यक्ति पहाड़ के शिखर पर पहुंच जाए तो उसे प्रकृति के रम्य रूप का जो दर्शन होता है वह अदभुत होता है तथा वह आनंद से भर देता है यह श्रैय है।
भोग की इस अंधी दौड़ में आत्मा का सौंदर्य नष्ट होता है
मुनि श्री ने पूछा कि जिसमें कठनाई है लेकिन, अंत अच्छा है तथा जिसमें आराम है अंत बुरा बताइए। आप किसे पसंद करेंगे? मुनि श्री ने कहा कि जीवन में जितना आराम पसंद करोगे,उतने कमजोर बनोगे और जितना कष्ट सहोगे उतने समर्थ बनोगे। एक विचारक ने लिखा कि कठिन समय मजबूत इंसान को जन्म देता है और सरल समय इंसान को कमजोर बनाता है। जितने आराम तलब जीवन को जिओगे उतने कमजोर बनोगे। उत्तम तप धर्म का यही संदेश है। भोग की इस अंधी दौड़ में आत्मा का सौंदर्य धुंधला पड़ता जा रहा है तप का अर्थ केवल उपवास, मौन या शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि वासनाओं की लपटों से अपने आपको बचाए रखना तथा अपनी आत्मा में रमे रहना ही उत्तम तप है। मुनि श्री ने कहा कि सोशल मीडिया से कुछ क्षण का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन, इससे आत्मा की भूख नहीं मिटती। आत्मा के स्थाई आनंद के लिए विलंबित सुख, प्रलोभनों में स्थिर, क्रोध, मोह,राग, द्वेष की स्थिति उत्पन्न होने पर अपने आपको शांत रखना तप है तथा यह मानसिक अनुशासन को सिखाता है। जैसे अग्नि में सोना तप कर कुंदन बनता है वैसे ही संकटों की आंच से आत्मा निखरती है।













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