जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ का गर्भ कल्याणक चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है। इस बार यह 22 मार्च को आ रहा है। जैन धर्म के श्रावक-श्राविकाएं इस दिन भगवान शीतलनाथ के गर्भ कल्याणक पर देश भर के मंदिरों में पूजन-अर्चन और आराधना में लीन रहते हैं। अभिषेक, शांतिधारा, गर्भ कल्याण के विधान आदि किए जाएंगे। भगवान शीतलनाथ जैन समाज के 10वें तीर्थंकर थे और उन्होंने जैनधर्म को अपनी देशनाओं से खूब समृद्ध किया। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला के तहत आज पढ़िए उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संकलत्व और संयोजकत्व में यह प्रस्तुति….
इंदौर। जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ का गर्भ कल्याणक चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है। इस बार यह 22 मार्च को आ रहा है। जैन धर्म के श्रावक-श्राविकाएं इस दिन भगवान शीतलनाथ के गर्भ कल्याणक पर देश के मंदिरों में पूजन-अर्चन और आराधना में लीन रहते हैं। भगवान शीतलनाथ जैन समाज के 10वें तीर्थंकर थे और उन्होंने जैनधर्म को अपनी देशनाओं से खूब समृद्ध किया। जैन धर्म के पुराणों के अनुसार पुष्करवर द्वीप के पूर्वार्ध भाग में मेरू पर्वत के पूर्व विदेह में सीता नदी के दक्षिण तट पर ‘वत्स’ नाम का एक देश है। उसके सुसीमा नगर में पद्मगुल्म नाम का राजा रहता था। किसी समय बसंत ऋतु की शोभा समाप्त होने के बाद राजा को वैराग्य हो गया और आनंद नामक मुनिराज के पास दीक्षा लेकर विपाक सूत्र तक अंगों का अध्ययन किया। तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके आरण नामक स्वर्ग में इंद्र हो गया। इस जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में मलय देश के भद्रपुर नगर का स्वामी दृढ़रथ राज्य करता था। उनकी महारानी का नाम सुनंदा था। रानी सुनंदा ने चैत्र कृष्ण अष्टमी के दिन उस आरणेंद्र को गर्भ में धारण किया और माघ शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान शीतलनाथ को जन्म दिया।
भगवान शीतलनाथ को केवल ज्ञान की प्राप्ति
अनंतर छद्मस्थ अवस्था के तीन वर्ष बिताकर पौष कृष्ण चतुर्दशी के दिन बेल वृक्ष के नीचे भगवान शीतलनाथ जी को केवल ज्ञान को प्राप्त हुआ।
भगवान शीतलनाथ का इतिहास
भगवान का चिन्ह: कल्पवृक्ष
अन्य नाम: शीतलनाथ जिन
जन्म स्थान: भद्रपुरी
जन्म कल्याणक: माघ कृ 12
केवल ज्ञान स्थान: सहेतुक वन
दीक्षा स्थान: सहेतुक वन
पिता: महाराजा दृढ़रथ
माता: महारानी सुनंदा
देहवर्ण: तप्त स्वर्ण
मोक्ष: आश्विन शु. 8 सम्मेद शिखर पर्वत
भगवान का वर्ण: क्षत्रिय (इश्वाकु वंश)
लंबाई-ऊंचाई- 90 धनुष (270 मीटर)
आयु: 1,00,000 पूर्व
वृक्ष: बेल वृक्ष
यक्ष: ब्रह्मेश्वर देव
यक्षिणी: सुतारा
प्रथम गणधर: श्री अनगार
गणधरों की संख्या: 81
भगवान शीतलनाथ का निर्वाण
भगवान शीतलनाथ सम्मेदशिखर पहुंचकर एक माह का योग निरोध कर आश्विन शुक्ल अष्टमी के दिन कर्म शत्रुओं को नष्ट कर मुक्तिपद को प्राप्त हुए।













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